Friday, March 9, 2007

प्रकाशक की ओर से

विदेह से सदेह की ओर गमनागमन । दूसरे शब्दों में आत्महत्या से आत्मरक्षा की ओर प्रस्थान । इसे हम यों भी कह सकते हैं कि जीवन- मरण से जीवन-भरण की ओर रवानगी । सम्पूर्ण संसार का सर्वाधिक हृदय विदारक महामारी यदि कोई कोई है तो वह है –‘आत्महत्या’।
इन दिनों अमेरीका,श्रीलका, इंग्लैण्ड, हालैण्ड भारत, पाकिस्तान, चीन और जापान में ही नहीं आखिल विश्व के कोने-कोने में आत्महत्या करने वालों की संख्या बड़ी तेजी से बढ़ रही है। ऐसा कोई दिन नहीं है जिस दिन के समाचार-पन्नों में आत्महत्या संबंधी समाचार प्रकाशित न हुआ हो । मरने के कारणों की सूची में आत्महत्या तमाम रोगों को बहुत पीछे छोड़ दिया है। दुःख, कष्ट, व्यथा और व्याकुलता प्रत्येक युग में रहा है और रहेगा । लेकिन आत्महत्या किसी समस्या का समाधान किसी भी युग में न कभी रहा है और रहेगा । सभी धर्मो में ‘आत्महत्या’ को पाप माना गया है । सभी विधानों में ‘आत्महत्या को दण्डनीय अपराध माना गया है । इसके बावजूद इस दुनिया में ऐसे लोगों की कमी नहीं हे जो आत्महत्या जैसे घृणित निर्णय बड़ी आसानी से ले लेते हैं । इस शोध परक कृति में भागीरथ प्रयास किया गया है कि एन-केन-प्रकारेण आत्महत्या की हद तक बढ़ा हुआ व्यक्ति पुनः जीवन धारा की और कौट सके ।


जयप्रकाश मानस
सृजन सम्मान,रायपुर,छत्तीसगढ़

No comments: