Friday, March 9, 2007

आँकड़े


मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण के आधार पर हम सत्रहवीं शताब्दी को पुनर्जागरण-काल, अठारहवी शताब्दी को पुनर्विवेचन-काल, उन्नीसवीं शताब्दी को उन्नयन-काल और बींसवी शताब्दी को चिंतन-काल और इक्कीसवीं शताब्दी को चिंताकुल अथवा चिंतातुर-काल के नाम से संबोधित कर सकते हैं । भौतिकवाद और सार्वभौतिक अर्थाभाव का दूसरा नाम है – 21 वीं सदी । अतएव मानव जीवन का अभावग्रस्त होना सर्वथा स्वाभाविक है । अभाव के फलस्वरूप व्यक्ति का चिंतातुर, चिंताव्यग्र अथवा मानसिक तनावग्रस्त होना बिलकुल स्वाभाविक है । आलस्य, नैराश्य, संत्रास, कुंठा, ऊब, अनिद्रा, विक्षिप्तता और अंततः आत्महत्या आज हमारे जीवन का आवश्यक अंग सा बन गया है । घर-द्वार, अंदर-बाहर, जाति-समाज, देश-परदेश, आस-पास, कार्यालय-वासालय इत्यादि प्रत्येक स्थल पर तनाव विद्यमान है ।जहाँ कहीं भी मनमोहक कार्य नहीं हो पाता वहीं मन उद्वेलित हो जाता है और इसी के साथ उत्पन्न होता है – ‘यत्नसाध्य महाप्रयाण’ विषयक कुत्सित विचार ।

न्याय पद्धति का यह एक सर्वमान्य सिद्धांत है कि प्रत्येक समस्या का समाधान है । जिस कारण तनाव होता है उस मानसिकता से मुक्ति संभावित है । वास्तव में तनाव का एक कारण अभाव होता है और दूसरा दुर्भाव । तनाव की स्थिति में हम यह सोचने लग जाते हैं कि हमारी स्थिति अन्य अनेक व्यक्तियों की अपेक्षा कितनी अधिक दयनीय है, चिंतनीय है, निंदनीय है जबकि हमें यह सोचना चाहिए कि हमारी स्थिति अन्य अनेक व्यक्तियों की अपेक्षा कितनी अधिक आदरणीय है, प्रशंसनीय है, वंदनीय है । ऐसा सोचने मात्र से हमें जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में ऐसे अनेक उदाहरण मिल जायेंगे जो हमारी अपेक्षा दीन-हीन, अभाव-दुर्भाव, पस्त तथा त्रस्त है । जब कभी भी हम अपेक्षाकृत निम्न व्यक्ति की सहायता हेतु योजना बनाने लगें तब तत्समय हमारा तनाव बिलकुल शिथिल पड़ जायेगा और हम एक नए व्यक्ति की भाँति आचरण करने लगेंगे, क्योंकि तत्समय हम अपने आपको उत्कृष्ट श्रेणी वाले व्यक्तियों के मध्य स्थित पायेंगे, क्योंकि चिंता केवल उन्हीं व्यक्तियों को सताती है जो केवल स्वार्थी होते हैं परमार्थी व्यक्ति को स्वार्थ संबंधी चिंता करके तनावग्रस्त होने का समय ही नहीं मिल पाता ।

प्रत्येक अवस्था वाले व्यक्ति के तनाव के भिन्न-भिन्न कारण होते हैं । बालकों के तनाव के मुख्य कारण होते हैं – पालकों तथा अभिभावकों का प्यार न मिलना, मनभावन वस्तुओं से वंचित रखना, अन्य बच्चों के साथ उनकी तुलना करना, अन्य बच्चों की प्रशंसा करना, अनावश्यक रूप से डाँट-डपट करना इत्यादि । युवा मन में तनाव के मुख्य कारण होते हैं – अर्थाभाव, शिक्षण-प्रशिक्षण में असफलता, असफल प्रेम संबंध, अउद्यम आदि । वृद्धजन के तनाव के मुख्य कारण होते हैं – दुर्बलता, संतानहीनता, अकेलापन, संतान का अयोग्य, अनुशासनहीन तथा कुमार्गी होना इत्यादि । आज व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, दूषित वातावरण इत्यादि अनेक ऐसे कारण हैं जो मानव जीवन को अस्वाभाविक एवं अमानवीय बना रहे हैं । दरअसल सादा जीवन उच्च विचार को हम रूढिवाद और पिछड़ेपन की पहचान मान रहे हैं और झूठा स्वाभिमान तथा दिखावा को प्रगति का प्रतीक । फलतः हमारा जीवन नारकीय बनता जा रहा है और हम चाह कर भी उससे छुटकारा पाने में अपने आपको असमर्थ पा रहे हैं । हमें ऐसी जीवन पद्धति अपनाना चाहिए जो तमाम तनावों से उत्पन्न अभिशापों से मुक्ति प्रदान करे । आत्महत्या कोई नई समस्या नहीं । यह सदियों से चली आ रही है, किन्तु वर्तमान में भारत में ही नहीं वरन् सम्पूर्ण विश्व में इसकी गति नये सिरे से क्रमशः बढ़ती ही जा रही है। अखिल विश्व में आत्महत्या की मात्रा व दर के सम्बन्ध में अब तक जो अध्ययन किये गये हैं तथा उनसे जो परिणाम व आँकड़ें प्राप्त हुए हैं उन्हें अधोलिखित शीर्षकों मे प्रस्तुत किया जा सकता है-

(1) विश्व
एक समय था जब न्यूयार्क के लगभग 108 वर्ष पुराने ब्रुकलीन ब्रिज तथा एम्पायर स्टेट बिल्डिंग (विश्व की सबसे ऊँची बिल्डिंग) आत्महत्या करने के लिए सर्वाधिक चर्चित थी, लेकिन अब तो अमरीका आदि देशों में पिस्तौल, बन्दूक बगैरह इतनी सहजता के साथ मिल जाते हैं कि कोई भी सामान्य व्यक्ति इस प्रकार के शस्त्रों को खरीदकर बड़ी आसानी से आत्महत्या कर लेता है। आज स्थिति यह है कि पूरे विश्व में प्रतिदिन केवल आत्महत्या के लगभग 1100 (एक हजार एक सौ) प्रकरण दर्ज किये जाते हैं।

(2) भारत :
भारत में प्रति 12 मिनट में एक आत्महत्या होती है। समूचे देश में सन् 1968 सन्1969 एवं 1970 में क्रमशः 40638, 43633 एवं 48428 आत्महत्याएँ हुई । सन् 1990 में भारत में कुछ करीब 49000 आत्महत्याओं के प्रकरणों में जहर तथा नींद की गोली खाकर मरने वालों की संख्या 10500, गले में फाँसी डालकर मरने वालों की संख्या 10000, कुआँ, तालाब, नदी तथा समुद्र में डूबकर मरने वालों की संख्या 7203, रेल से कटकर आत्महत्या करने वालों की संख्या 2700,मिट्टी तेल तथा पेट्रोल छिड़ककर व आग लगाकर जल मरने वालों की संख्या 3500 और ऊँची इमारतों से कूदकर मरने वालों की संख्या 554 से ऊपर थी । एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में प्रतिदिन मरने वालों की संख्या में से तकरीबन 1.33 प्रतिशत लोग आत्महत्या करते हैं । भारत में प्रतिदिन करीब-करीब 120 व्यक्ति आत्महत्या करते हैं ।

(3) प्रदेश
राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरों के नवीनतम रिकार्ड, वर्ष 1988 के अनुसार भारत में आत्महत्या दर 8.1 प्रति एक लाख व्यक्ति थी। केरल, त्रिपुरा, तमिलनाडू तथा पश्चिम बंगाल में यह दर क्रमशः24.7, 21.1, 17.9तथा 15.7 प्रति एक लाख व्यक्ति थी । इसके बाद क्रमशः कर्नाटक, असम, बिहार तथा अन्य राज्यों का नम्बर आता है। आत्महत्या की सबसे कम घटनाएँ जम्मू-कश्मीर मे होती है। यहाँ प्रति एक लाख व्यक्ति के पीछे 0.22 लोग ही आत्महत्या करते हैं ।

(4) नगर:
भारत के महानगरों में आत्महत्या बहुत होती है। एक सर्वेक्षण के अनुसार इन शहरों में 01 जनवरी, 1988 से 15 जून, 1989 तक बेंगलूर में 664, मद्रास में 278, कानपुर में 227,नागपुर में 120, दिल्ली में 119, बम्बई में 108, अहमदाबाद में 79, पुणे में 60 और जयपुर में 22 आत्महत्याएँ हुई ।

(5) नागरीकरण :
प्राथमिक सम्बन्धों के कारण गाँवों में लोग प्रायः एक दूसरे के सुख-दुःख में हमेशा साथ देते हैं, लेकिन शहरों में सर्वथा इसका अभाव रहता है। नगरों में व्यक्तिगत स्वार्थ की पूर्ति का बोलबाला रहता है। अड़ोस-पड़ोस तथा अगल-बगल तो बहुत दूर की बात है पारिवारिक सदस्यों के सात बी धनिष्ठ सम्बन्ध नहीं रखते । यहाँ तक जीवन-साथी के सात भी लगभग प्रतिदिन सम्बन्ध बिच्छेद (तलाक) की घटनाएँ होती रहती हैं। इन समस्त कारणों से नगरों के खासकर महानगरों के व्यक्तियों में जीवन के प्रति स्वस्थ लगाव नहीं होता । फलतः आए दिन आत्महत्याएँ होती ही रहती हैं, जबकि ग्रामों में यह प्रायः नहीं के बराबर है।

(6) आयु :
यद्यपि आयु की वृद्धि के साथ-साथ लोगों मे प्रौढ़ता एवं गम्भीरता की वृद्धि होती जाती है, तथापि कम आयु के लोगों की अपेक्षा अधिक आयु के लोगों की आत्महत्या दर अधिक होती है।

(7) लिंग :
भारत में स्त्रियों की अपेक्षा पुरूषों में आत्महत्या की दर अधिक है. आत्महत्या करने वाले भारतीयों में 61 प्रतिशत पुरूष तथा 39 प्रतिशत महिलाएँ होती हैं। यहाँ सफल आत्महत्याओं की संख्या पुरूषों में अधिक है और असफल आत्महत्याओं की संख्या महिलाओं में अधिक है।

(8) रंग :
गोरे लोग साँवलें व काले लोगों की अपेक्षा अधिक आत्महत्या करते हैं।

(9) धर्म :
कैथोलिकों की अपेक्षा प्रोटेस्टेंटों में आत्महत्याएं अधिक होती हैं ।
एक समय वह भी था जब बिल्कुल अन्जान व्यक्ति की मौत का समाचार सुनते ही सारे शहर में भयानक सन्नाटा छा जाता था, लेकिन वर्तमान समय में पड़ोसी की लाश को अनदेखा कर अपने रास्ते चल देने वालों की संख्या-क्रमशः बढ़ती ही जा रही है। आजकल प्रत्येक सुबह हर अखबार की सुर्खियों में हत्याओं के बीभत्स वर्णन होते ही हैं, जिन्हें पढ़ने के बाद भी हमारे दिलों की धड़कर, साँसों की गति तथा नाड़ियों का स्पन्दन अप्रभावित रहते हैं। आकाशवाणी तथा दूरदर्शन से जघन्य से जघन्य अपराध का समाचार सुनकर अथवा क्रूर से क्रूर हत्याकाण्ड को देखकर भी हमारे रोंगटे खड़े नहीं होते । मौत की गंध अब वातावरण में इस कदर घूल-मिल गई है कि हम उसके आदी हो गये हैं। आज स्थिति यह है कि मरना भी दैनिक आवश्यताओं की वस्तुओं के समान एक प्रकार से रोजमर्रा की खबर बन चुकी है। अब शमशानों का भयावह सन्नाटा और नाट्य मण्डली के वातावरण में कोई विशेष अन्तर नहीं रह गया है।

न केवल भारतीय संविधान में वरन् संयुक्त राष्ट्र संघ के मानव अधिकार सम्बन्धी घोषणा पत्र में भी मात्र अधिकार एवं सुख सुविधाओं पर आवश्यकता से अधिक जोर दिया गया है। वैधानिक दृष्टकोण से परिवार, समाज, देश, धर्म, पंथ एवं विश्व बन्धुत्व की भावना के प्रति कोई विशेष विधान नहीं बनाया गया : परिणामस्वरूप व्यक्ति के मन में कर्त्तव्य एवं दायित्व निभाने सम्बन्धी मानसिकता आज तक नहीं बैठ पायी है। मिलनसार लोग ही वास्तव में स्वर्गीय आनन्द का अनुभव करते हैं। एकांगी जीवन व्यतीत करने वाले लोग मनोरंजनात्मक व प्रफुल्लित जीवन से वंचित रहते हैं। यहाँ कोई पराया नहीं, सारी दुनिया हमारी है। दुनिया को अपनाने की सीख सर्वोत्तम सीख है और अपनापन ही सर्वोच्च जीवन दर्शन।

जब हम यह तर्क प्रस्तुत करते हैं, कि गर्भधारण और प्रसव वेदना का अधिकारी केवल माता ही है। पालन-पोषण व दूध का कोई कर्ज नहीं होता । पितृ ऋण नामक कोई कर्त्तव्य होता ही नहीं तथा पढ़ाना-लिखना तो गुरू का दायित्व है। रोजगार उपलब्ध कराना प्रशासन की जिम्मेदारी है और दहेज प्रथा उन्मूलन समाज की, तब हम निश्चित रूप से दिग्भ्रमित हैं। ज्ञानीजन अपने स्वार्थ के लिए नहीं जीते इसलिए उनकी आत्मा परिपूर्णता को प्राप्त करती है। जब हम स्वहिताय जीते हैं और स्वसुखाय सोचते हैं कि दुनिया को मारे सुख सुविधाओं का ख्याल रखना चाहिए ,किन्तु दुनिया के सुख सुविधाओं का खयाल रखना हमारे लिए आवश्यक नहीं तब यही तथाकथित समझदारी हमारे लिए आत्मघातक सिद्ध होती है।
********

लक्षण एवं सुझाव


हममें से लगभग प्रत्येक के मुँह से किसी-न किसी समय ये शब्द अवश्य निकले हैं, कि “हे सर्वशक्तिमान । मुझे अपने पास बुला ले और तमाम कष्टों से मुक्ति दिला दे ।” इस दुनिया में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा, जिसने बेहद निराशा के क्षणों में कभी-न-कभी अपनी जिन्दगी से ऊब महसूस न की हो । प्रत्येक राहगीर रास्ता भूलता नहीं है। बिना पूछताछ के कोई भी यात्रा असम्भव है। इस भटकावपूर्ण स्थिति में दिशा-निर्देश नितान्त आवश्यक है। आज के इस अत्यन्त तीव्रगामी युग में तकरीबन हरेक मानव अपनी ही दुनिया में इतना व्यस्त है कि उसके पास समाज के इस वर्ग पर समुचित ध्यान दे सकने के लिए वक्त ही नहीं है।

आत्महत्या से पूर्व व्यक्ति विषयनान्तर्गत वार्तालाप करता है, तत्संबंधी साहित्य पढ़ता या लिखता है। वह अक्सर बोल-चाल में जाने-अनजाने कह जाता है कि मैं आत्माहत्या कर लूंगा, इससे तो अच्छा होता मैं मर जाता अथवा इससे तो अच्छा होता मैं पैदा ही नहीं हुआ होता । वह अपने आप को बेहद असहाय महसूस करता है या वह अपने जीवन को अत्यन्त सारहीन समझता है। वह अक्सर आत्महत्या के तरीकों के संबंध में पूछताछ करता रहता है। मृत्यु ,हिंसा, चाकू, छुरी तथा बंदूक के बारें में चर्चा करता रहता है। अचानक वह अधिक उदार हो जाता है और अपनी वस्तुओं को बाँटने लगता है। वह तीव्रगति से कम समय में अधिकाधिक लोलों से मिलने का प्रयास करता है और लोगों को अच्छा; अलविदा कहकर अथवा-‘किसी भी प्रकार से वह अन्तिम मिलन है-’ का संकेत दे देता है। यदि कोई बार-बार ऐसा करता हैं अथवा इनमें से कई तथ्य प्रकट करता है तब आप सचेत हो जाइये और उसके समक्ष यथासम्भव आशावादी विचार ही रखें, प्रतिउत्तर प्रस्तुत करें।

आपके मन में यदि निराशावादी विचार उत्पन्न हो रहे हों, आत्महत्या करने का विचार उत्पन्न हो रहा हो तो सर्व प्रथम आप किसी मनोचिकिस्सक के समक्ष अपने आप को प्रस्तुत करें । अपने आप को क्रमशः अधिकाधिक सक्रीय रखने का प्रयास करें। अधिक; और अधिक लोगों से मिलें । अधिक; और अधिक लोगों से बात करें । कभी भी किसी समय भी अकेला रहने की कोशिश न करें । आत्माहत्या के जितने भी सम्भावित साधन हैं अपने आप को दूर रखें । उन तक आप न पहुँचे या उनको अपने पहुँच से दूर रखें । कोई भी दो काम जो आपको सर्वाधिक पसंद हों दिन में कम से कम दो बार अवश्य कीजिए। पूजा पाठ, गीत-संगीत,नृत्य-वादन, पठन-पाठन, खेल-योगाभ्यास आदि-आदि में से । अपने आप को हमेशा व्यस्त रखें, ठहराव नहीं होना चाइए मन-मस्त रहें, व्यस्त-व्यस्त रहें; अस्त-व्यस्त नहीं ।

अमरीका के आत्मघात विज्ञान संगठन की 15 वीं वार्षिक बैठक के अन्तिम दिन न्यूयार्क शहर में 500 से अधिक आत्मघात विशेषज्ञ उपस्थित थे। कई दिन तक चलने वाली सभा की समाप्ति से पूर्व जब सभा संचालक ने श्रोताओं से प्रश्न करने के लिए कहा, तब पीछे बैठे लम्बे बालों वाले एक बेहाल नवयुवक ने खड़े होकर पूछा कि “क्या समाधि आत्महत्या की रामबाण औषधि नहीं है ?” सभा में उपस्थित महान् आत्माओं की दबी हँसी के बीच संचालक महोदय बोले कि “यह बड़ा रोचक प्रश्न है, किन्तु अब हमें बैठक समाप्त करनी चाहिए ।” उन्होंने सभी को धन्यवाद देते हुए कहा-मुझे विश्वास है कि इस भाषण से हम सब लाभान्वित हुए हैं। नौजवान बैठने ही वाला था कि कर्नवर्न तत्काल माईक्रोफोन की ओर बढ़े । “मैं इस प्रश्न का उत्तर देना चाहता हूँ” कहते हुए उन्होंने बड़ी सावधानी और आदर के साथ उस युवक के प्रश्न का समुचित उत्तर दिया ।

आत्महत्या निवारण केन्द्रों में सर्वाधिक प्रसिद्ध “समारिटंस” है। ये केन्द्र सन् 1953 में उस समय प्रारम्भ हुए जब चौदह वर्षोया एक अंग्रेज लड़की ने पहली बार मासिक धर्म होने पर आत्माहत्या कर ली थी। अन्त्येष्टि के समय उपस्थित पादरी चैड वारा ने घोषणा की कि “संकट की घड़ी में मैं लोगों की समस्या जानने के लिए हर समय मिलूँगा ।” चैड वारा का ख्याल था कि बहुत से लोग डर के कारण अपनी बात नहीं कह पाते और जो मदद मिल सकती है, वह भी नहीं ले पाते । सन् 1975 के आसपास “समारिटन” की 165 शाखाएँ इंग्लैड में थी और उनमें 18000 स्वयंसेवक थे। अब तो “समारिटन” को दुनिया भर में शाखाएँ फैल गई है। 1990 के दशक में बम्बई में भी इस तरह की संस्था खोली गई है।

सामान्य चिकित्सकों को आत्मघाती प्रवृत्ति वाले लोगों का इलाज करने हेतु सबसे अच्छा अवसर मिलता है, किन्तु अधिकाँश चिकित्सक अपने जीवन में आत्महत्या सम्बन्धी शायद ही कभी कोई प्रवचन सुने होते हैं। लगभग 75 प्रतिशत व्यक्ति आत्महत्या से पूर्व के चार महीनों के दरमियान किसी-न किसी डॉक्टर के पास जातें हैं, लेकिन ये डॉक्टर इस सम्बन्ध में बहुत कम प्रशिक्षित होते हैं। आज प्रायः सभी चिकित्सक आत्महत्या को मानसिक स्वास्थ्य से सम्बद्ध समस्या मानते हैं, इसलिए यह मानकर चलते हैं कि मनः चिकित्सकों को आत्महत्या सम्बन्धी काफी जानकारी होगी, लेकिन उन्हें भी अभी बहुत कुछ सीखने की जरूरत है, क्योंकि आत्मघात की प्रवृत्ति एक लक्षण है, रोग का निदान नहीं।

बूस दाँतों का मत हैं कि पुलिस भी इस बारे में काफी प्रयत्न कर रही है। न्युयार्क शहर की आपातकालीन सेवा यूनिट के अधिकारी फ्रैंक मैलामर का कथन है कि हम अपने उपकरणों के साथ-साथ सद्-भाव, धैर्य व आदर भाव भी लेकर आते हैं। सन् 1982 में इस यूनिट को ऐसे 1661 मामले सौंपे गए, जिनमें मकानों से कूदने के कारण दुर्घटना होने की आशंका थी, इनमें से मात्र दस प्रतिशत ही घातक सिद्ध हुए । आत्महत्या विशषज्ञ अनुभव करते हैं कि प्राणाघाती उपायों तक पहुँच सीमित कर देने मात्र से भी आत्माहत्या करने वालों की संख्या घटेगी। जैसे-बंदूक, पिस्तौल आदि रखने पर नियन्त्रण, डॉक्टर की पर्ची के बिना दवाएं बेचने पर अपेक्षाकृत और अधिक नियन्त्रण, मीनारों आदि पर जाल की व्यवस्था। एक अध्ययन के अनुसार जिन 515 व्यक्तियों को कूदने से रोका गया उनमें से सिर्फ 25 लोगों ने ही आत्महत्या की।

अधिकांश व्यक्ति, सर्वगुण सम्पन्न या बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न तो नहीं, मगर कुछ प्रतिभा सम्पन्न जरूर होते है। यह बात और है कि उन्हें अपनी प्रतिभा को उजागर करने का अवसर नहीं मिल पाता । ऐसे व्यक्ति लगभग हर सम्भव जीवन जीना चाहते हैं। यदि जीवन में उन्हें कोई चीज नहीं मिल पाती तो वे किसी और से काम चला लेते हैं। अर्थात् और भी राहे या फिर तू नहीं तो और सही, और नहीं तो और सही, लेकिन आत्महिंसा की प्रवृत्ति वाले मनुष्यों में प्राप्त साधनों के बल पर दुनिया में जीने की क्षमता नहीं रहती । ऐसे व्यक्ति आपनी शर्तों पर ही जीना चाहते हैं, कोई अन्य समझैते अथवा समायोजन करने को वे तैयार नहीं होते । जैसे यदि तुमने मुझसे प्यार नहीं किया तो मैं आत्महत्या कर लूँगा । यदि अमुक समयावधि के अन्दर मुझसे सम्बन्धित अमुक समस्या का समाधान नहीं हुआ तो मैं आत्महत्या कर लूँगा । यदि तुम या तुम लोग मुझे इस कदर परेशान करते रहोगे तो मैं आत्महत्या के लूँगा। वगैरह-वगैरह।

अधिकाँश व्यक्ति उपरोक्तानुसार आत्महत्या करने की धमकी अथवा निम्नानुसार आत्महत्या करने की इच्छा के संकेत बातचीत के दौरान दे देते हैं। जैसे-अब तुम मुझे ज्यादा दिन नहीं देखोंगे। कल तुम या तुम लोग मुझे याद करोगे आने वाले कुछ दिनों में मैं गजब ढाने वाला हूँ। जिन्दगी के प्रति निराशावादी विचारधारा व्यक्त करना और खुद के प्रति नफ़रत जतलाना । बेचैनी, गहन हताशा या फिर आत्महत्या सम्बन्धी चर्चा करना। आदि-आदि । कुछ लोग अपने व्यवहार से भी आत्महत्या करने के संकेत दे देते हैं जैसे-अपनी प्रिय चीजों से लगाव न रहना । खाने-पीने तथा सोने-जागने की आदतों में बदलाव । पढ़ाई में एकाएक तेज हो जाना या अचानक पिछड़ना । डायरी लिखने में अधिकांश समय लगाना। सारे जरूरी काम द्रुतगति से निपटाना। अपेक्षाकृत अधिक चिड़चिड़ाना । आत्महत्या सम्बन्धी योजना बनाना । आत्महत्या करने का प्रयास करना, इत्यादि।

आत्महत्या की प्रवृत्ति वाले लोगों को कभी-कभी मात्र इस बात से बड़ा भरोसा व विश्वास मिलता है कि कोई व्यक्ति उसके साथ है अथवा कोई उसकी सहायता करना चाहता है। कभी-कभी ऐसे लोग अपनी बात कहकर अपना दुःख हल्का करना चाहते हैं। इसलिए ऐसे लोगों की बात हमें ध्यान से सुनना चाहिए। वह जो कह रहा है उसे अनसुना नहीं करना चाहिए। अगर उनकी बातें बिना सिर-पैर की हैं तो भी उनसे बहस नहीं करना चाहिए । यदि उनकी बात परस्पर विरोधी है तो भी विषय नहीं बदलना चाहिए। आत्महत्या सम्बन्धी उनकी दलीलों को जीतने की कोशिश नहीं करती चाहिए । उन्हें कभी चुनौती नहीं देनी चाहिए। उनके समक्ष बहुत शांत रहना चाहिए और उन्हें केवल सांत्वना देनी चाहिए।

आत्महत्या का प्रयास करने वाले व्यक्ति के प्रति कभी आलोचनात्मक रवैया मत अनपाइए। आत्महत्या का प्रयत्न करने का चाहे जो भी तरीका रहा है, सम्बन्धित व्यक्ति शोक अथवा सदमें की स्थिति में होगा। ये व्यथित लोग अपनी निंदा किये जाने या सजा दिये जाने से डरते हैं, इसलिए उनकी निंदा मत कीजिए और उनकी स्थिति के बारे में किसी प्रकार का कोई मजाक मत कीजिए । उसे आश्वासन दें। उसे शांति व सद्भावनापूर्वक बताएँ कि उसकी इस हरकत का दूसरों पर क्या असर पड़ सकता है। यदि आवश्यक हो तो अन्य लोगों से भी मदद लें।

हकीकत में आत्महत्या का प्रयत्न एक प्रकार से सहायता की अपील है। यह एक संत्रस्त व्यक्ति का समाज से यह कहने का तरीका है कि वह उसे वर्तमान दुःखद स्थिति से निकाले । सभी प्राणियों में जीवन रक्षा की प्रवृत्ति इतनी मजबूत होती है कि वे मरना नहीं चाहते । अवचेतन मन में वे आशा करते हैं कि उन्हें समय रहते बचा लिया जाये । यदि सहायता की पुकार का कोई असर नहीं हुआ या फिर तत्संबंधी समस्या का समाधान नहीं किया गया तो संबंधित व्यक्ति आत्महत्या का पुनः प्रयास करता है । एक महिला ने आत्महत्या से पूर्व 11-11 बार आत्महत्या का प्रयास किया था। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि इससे सहयोग व सहानुभूति के साथ व्यवहार किया जाए और यह जरूरी है कि ऐसे व्यक्ति को कभी भी किसी भी समय अकेला न छोड़ा जाए।

सम्भवतः आत्महत्या की प्रवृत्ति वाले व्यक्ति की स्थिति उस शराबी के समान ही होती है जो जानता तो है कि शराब बुरी बला है, लेकिन फिर भी वह पीता है। उसके अलावा जब नशे में रहता है तब भी वह जानता है कि कुछ ज्यादा ही बोल रहा है, किन्तु वह अपनी जुबान को रोक नहीं सकता। एक पुलिस अधीक्षक आत्महत्या से पूर्व दो पत्र लिख गए हैं। पहले पत्र में उन्होंने पुलिस के दो उच्च अधिकारियों द्वारा की गई असहनीय डॉट-डपट का उल्लेख किया है और दूसरे पत्र में उन्होंने लिखा है कि मैं बहुत हतोत्साहित हूँ । आत्महत्या के बाद मेरी पत्नी, बिटिया तथा वृद्ध माताजी का क्या होगा ? उन्होंने महसूस किया है कि आत्महत्या के निर्णय से उनके परिवार में पत्नी, माँ आदि को भारी आघात पहुँचेगा तथा वे इस तरह उनके प्रति अपनी जिम्मेदारियों को भी पूरा नहीं कर रहे हैं, लेकिन मानसिक तौर पर समझ नहीं पा रहे हैं कि लगातार बढ़ते पागलपन को कैसे रोकें ? वे जानते है कि उनके इस निर्णय से उनकी छबि और गिरेगी, लेकिन उनके समझ में नहीं आ रहा है कि वे क्या करें ? अतिरिक्त जिलाधीश के मतानुसार यदि उनकी पत्नी उनके साथ होती तो वे शायद आत्महत्या नहीं करते।

मई एवं जून के महिनों में छत्तीसगढ़ अंचल के रायपुर, रायगढ़, चांपा तथा सक्ति आदि के नाम छत्तीसगढ़ तथा भारत में ही नहीं, बल्कि विश्व में सर्वाधिक गर्म शहरों की सूची में कई बार अंकित रहे हैं । इस गर्मी से उत्पन्न तपन, जलन, बेचैनी और व्याकुलता एक क्षेत्रीय महोदय के लिए सहनशक्ति से बाहर की बात बनती जा रही थी । वे केवल गर्मी के महिनों में अपनी विभिन्न हरकतों और शब्द संकेतों के माध्यम से अनेकानेक बार बता चुके थे कि उन्हें जीने की इच्छा नहीं होती तथा एक न एक दिन वे आत्महत्या कर ही लेंगे । उन्होंने जो 24 वर्ष के थे, अन्ततः आत्महत्या कर ही ली। यदि उनके सम्बन्धी गर्मी के मौसम के लिए ही प्राकृतिक या कृत्रिम साधनों से ठण्डक की व्यवस्था कर देते तो सम्भवतः वे रेल से कटकर आत्महत्या नहीं करते ।

एक महिला आरक्षण के विरूद्ध अपने पति के तर्कों पर तो ध्यान देती रहीं, किन्तु आग लगाने के एक घण्टा पहले जब उनकी बेटी ने आत्मदाह करने की इच्छा व्यक्त की तब उन्होंने- “जो तुम्हारे मन में है, उसे तत्सम्बन्धी जिम्मेदार व्यक्ति को जाकर बताओ, मौत कोई हल नहीं--” कहते हुए हँसकर टाल दी, जबकि उनकी बेटी की बात आत्महत्या की प्रवृत्ति का स्पष्ट संकेत था। यदि वे अपनी बेटी की बात को बड़ी गम्भीरता से लेती और उस पर कड़ी निगरानी रखतीं तो वह सम्भवतः आत्महत्या नहीं करती।

आत्महत्या करने वाले लोग यह सोचते हैं कि जीवन मुसीबतों का एक पुलिंदा और मृत्यु शाश्वत शांति । उनका यह सोचना भूल है कि उन्हें शांति मिल ही जाएगी। अचूक से अचूक निशानेबाज भी कभी-न-कभी चूकता ही है। आत्महत्या का कोई उपाय ऐसा नहीं है जो बिल्कुल अचूक हो । आत्माहत्या के अचूक से अचूक तरीके से भी चूक सम्भव है। अंग-भंग अथवा अपंग सम्भव है। एक 12 वर्षीय बच्चे का जिगर नींद की अधिक गोलियाँ खा लेने के कारण बिल्कुल खराब हो गया है, जिसका जिगर खराब हो ऐसा व्यक्ति एकाएक नहीं मरता । उसका सारा शरीर पीला पड़ जाता है और अंत बड़ा कष्टदायी होता है। एक 24 वर्षीय नवयुवक ने अपने सिर में गोली दागी थी । अब वह एकग ही टाँग से चलता है। उसकी एक बाँह बेकार हो गई है। वह एक कान से बहरा और एक आँख से अँधा है। एक 15 वर्षीय युवक ने बिजली के झटके से आत्महत्या करतने की कोशिश की थी। उसकी दोनों बाँहें बेकार हो गई हैं। एक अच्छा खासा समझदार व विनोदप्रिय व्यक्ति की एक इमारत से छलाँग लगाने से मरने की इच्छा तो पूरीनहीं हुई, ऊपर से उसके दिमाग का मलीदा (चूरमा) बन गया। अब उसकी मानसिक स्थिति अस्पष्ट रहती है, उसे दौरे पड़ते हैं, वह लड़खड़ा कर चलता है। अब उसे हमेशा देखभाल की जरूरत पड़ेगी । इसी प्रकार अधिकाँश आत्महत्या के प्रयास सफल नहीं हो पाते। आत्महत्या के बेहद कारगर तरीके अपनाने के बावजूद वे नहीं मर सकते। आत्मघाती प्रवृत्ति वाले लगभग सभी व्यक्ति यही सोचते हैं कि अब तो हम यूँ ही बड़ी आसानी के साथ मर जाएँगे और हमें मरने के बाद ही चैन मिल ही जाएगा, लेकिन यह कोई नहीं सोचता कि असफल आत्महत्या या मरने (सफल आत्महत्या) के बाद भी तैन न मिले तब कहाँ जाएँगे ?
***********

आत्महत्या रोकने के लिए कार्यरत संस्थाएँ –



1. ‘साथ’
बी- 12, नीलांबर कांप्लेक्स,
एच.एल. कामर्स कालेज रोड
अहमदाबाद-380006
दूरभाष : 91-79-6305544
Website –www.saath.org

2. सुमैत्री’
एन.डी.एम.सी.कांप्लेक्स,
प्रथम तल, 48 बाबर रोड,
निकट बंगाली मार्केट, नई दिल्ली -110001
दूरभाषः 91-11-3710763
Websiste –www.sumaitri.org

3. ‘लाइफ लाइन फाउंडेशन’
28-ए शरत बोस रोड, कोलकाता- 700020
दूरभाष : 91-33-474 4704
Website –
www.education.vsnl.com/nuh

4. ‘द सामारितन सहारा’
सेवानिकेतन सर जे.जे.रोड,
बायकुला ब्रिज, मुंबई-400709
दूरभाष : 91-22-3073451

5. आसरा’
ए-4 नंवर व्यू, सी. एच.एस. प्लाट नंबर-43,
सेक्टर-7 कोपरखैरां, नई मुंबई-400709,
दूरभाष : 91-22-7546669

6. ‘रोशनी’
आनंद सिनेमा के पीछे, एम.पी.रोड,
सिंकंदराबाद -500003
दूरभाष : 91-40-7904646
************

स्वेच्छामृत्यु


सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न गणराज्य भारत में सन् 1980 में “मर्सी फिलिंग बिल” लाया गया था, लेकिन सदन ने उसे स्वीकार नहीं किया। विपक्षियों की यह दलील थी कि कसी भी सम्पन्न रोगी के रिश्तेदार उसकी सम्पत्ति के लोभ में “निजात मौत” के नाम पर उसी जान ले सकते हैं। सन् 1986 में प्रो. वर्धे ने “इच्छा मृत्यु” संबंधी विधेयक पेश किया था । इसमें विशेष रूप से यह प्रावधान रखा गया था, कि एक तो किसी डॉक्टर को रोगी की स्वेच्छा के बिना उसकी चिकित्सा बन्द करने का अधिकार नहीं होगा और दूसरी बात डॉक्टर रोगी की स्वेच्छा से भी चिकित्सा केवल तभी बन्द कर सकता है जब संबंधित रोगी की चिकित्सा के लिए कोई दवा अथवा अन्य साधन उपलब्ध न हो । सदन ने इसे भी स्वीकार नहीं किया ।

चीन में यद्यपि “सुख-मृत्यु” अथवा “निजात मौत” की अनुमति देने वाला कोई कानून नहीं है, लेकिन फिर भी वहां “निजात मौत” के अनेक मामले सामने आये हैं । चीन के कई चिकित्सालयों में ऐसे मरीजों को कष्ट कर जीवन से मुक्ति दिलाना आम बात बन गई है जिनकी जीवन रक्षा लगभग असभव हो गई हो । लगभग चार वर्ष पूर्व शंघाई में आयोजित एक गोष्ठी के अनुसार एक चिकित्सालय में पिछले तीन वर्षा में हुई 563 मरीजों की मृत्यु में से 28प्रतिशत निजा तमौत के तरीके से हुई है ।

अमरीका के 62 वर्षीय डॉ, जैंक केबोर किंयन ने तिल-तिल कर मरते लोगों को मौत की सुखद नींद सुलाने के लिए “डेथ मशीन” का आविष्कार किया था , परन्तु फरवरी सन् 1991सें उस पर मुकदमा चलाया गया । न्यायालय ने चिकित्सक को हत्या के अपराध से बरी करते हुए आदेश दिया कि “डेथ मशीन” का प्रयोग न करें।

सन् 1991 में ही ग्रेंड जूरी के उस निर्णय ने “डेरेक हम्फ्री” द्वारा लिखित “फाईनल एक्जिट” अथवा “अन्तिम प्रस्थान” नामक आत्महत्या के तरीके मुझाने वाली पुस्तक की लोकप्रियता में चार चांद लगा दिया, जिसमें आदेश दिया गया कि “ल्यूकेमिया” नामक रोग से पीड़ित एक हताश मरीज को आत्महत्या करने के तरीकों की जानकारी देने के लिए “हेमलॉक सोसायटी” के सुपुर्द करले वाले डॉक्टर निमोथी ईक्विंल पर कोई अभियोग न लगाया जाए ।

कनाडा को एक महिला “श्रीमती सूई रोडरिग्ज” की एक गुमनाम डॉक्टर की सहायता से हाल ही में हुई मृत्यु ने कनाडा में “इच्छामृत्यु” के अधिकार के पक्ष में विधान बनाए जाने की मांग को जन्म दिया है । कनाडा के एक सांसद “श्री स्वेन्द राबिन्सन” को इसका पता चला तो उन्होंने इस स्वत्व को वैधानिक मान्यता दिलाने के लिए एक गैर सरकारी विधेयक संसद में प्रस्तुत कर दिया है। उनकी यह मान्यता है कि ऐसी घातक बीमारी से पीड़ित मरीज को जिसका कोई ज्ञात इलाज है ही नहीं, सांस लेने की कृत्रिम यंत्रों से बंधे पड़े रहकर सम्मान-शून्य जीवन को घसीटने के लिए विवश किए जाने का कोई औचित्य नहीं है। वैसे “श्रीमती सूई रोडिरग्ज” ने इस स्वत्व के लिए कनाडा के उच्चतम न्यायालय लड़ी थी, पर असफल रहीं।

जर्मनी में तो “डेर्थ विद डिग्निटी” (सम्माननीय मृत्यु) नामक संस्था कई वर्ष से काम कर रही है। इस संगठन के पास अपने सादस्यों की लिखित सहमति का भरपूर भण्डार जमा है । यह सहमत उन्होंने स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मन की अवस्था में अंकित की है। इस संस्था के सदस्यों की मान्यता है कि यदि जिन्दगी जीने लायक न रहे तो फिर जीने से क्या लाभ ?

ब्रिटेन की सरकार ने ऐसे विधान का प्रारूप बनाने का सचिवालय को आदेश दिया है कि जिसमें जीवित वसीयतों को मान्यता मिल जाएगी । इसके तहत रोगी यह वसीयत लिख सकता है कि जब उसकी जीवन रक्षा संभव न हो तो डॉक्टर उसकी पीड़ा को और न बढ़ाते हुए सभी जीवन रक्षक उपकरण हटा लें।

जापान में अपने सम्मान के लिए “हाराकारी” (आत्महत्या का एक प्रकार) कर लेने को धार्मिक तथा सामाजिक मान्यता भी प्राप्त हो गयी है। यद्यपि अधिकांश उन्नत देशों में आत्महत्या को अपराध नहीं माना जाता । पाश्चात्य देशों में इसके लिए दण्ड का कोई प्रावधान है ही नहीं, तथापि आज दिनांक तक किसी भी देश द्वारा, किसी भी प्रकार के आत्महत्या को वैधानिक मान्यता प्राप्त नहीं हुआ है और होना भी नहीं चाहिए क्योंकि अधिकार पाया जाता है, लिया जाता है, देता कोई नहीं । यहां जयशंकर प्रसाद जी की यह उक्ति नितान्त प्रासंगिक है कि “अधिकार कितना मादक और सारहीन है। अपने को नियामक और कर्ता समझाने की बलवती स्पर्धा उससे बेगार कराती है।”

अपने आपको विधाता, निर्माता,मालिक,परम पिता परमेश्वर, सर्वेश्वर समझने वाले किसी शरीरांग विशेषज्ञ, किसी रोग विशेष के विशेषज्ञ, यंत्र संचालन विशेषज्ञ एवं अन्य अनेकानेक महान से महानतम विशेषज्ञों का अत्यन्त कातर स्वर, ह्रदय विदारक आर्तनाद, दर्दनाक कराह, बेहद बेचैन, विवशतापूर्ण, अधीर और लाचार विचार, धैर्यहीन दुःखित और व्याकुल गुहार है कि जिसका कोई ज्ञात इलाज न हो तो विशेषज्ञों को अज्ञात इलाज करने का अधिकार होना चाहिए । जिसकी चिकित्सा संभव न हो तो विशेषज्ञों को उसकी इहलीली समाप्त करने का अधिकार होना चाहिए । यदि रोगी के मुंह में डालने के लिए कोई दवा उपलब्ध न हो तो विशेषज्ञों को रोगी का मुंह बन्द करने का अधिकार होना चाहिए ।

मानव को चाहिए कि वह सांसारिक तथा लौकिक साधनों के साथ अपना सम्बन्ध न जोड़े, उनको महत्व देकर उनका दास न बने, अपने आपको उनके अधीन न माने, अपने लिये उनकी आवश्यकता न समझे । जैसे किसी को कोई अधिकार मिल जाता है तो उसके मिलने से उस अधिकार का प्रयोग के लिए वह अपने आपको स्वतंत्र समझता है, पर वास्तव में वह उस अधकार के अधीन हो जाता है, उस अधिकार का दास बन जाता है और अपना पतन कर लेता है । बड़ी विचित्र किन्तु सत्य बात यह है कि इस पतन में भी वह अपना उत्थान मानता है और उसके होकर भी वह अपने आपको स्वाधीन मानता है।

निष्कर्ष यह है कि स्वाभाविक मृत्यु से ही अपना आत्मोद्धार संभव है। सुख-मृत्यु, निजात मौत, दया मृत्यु, सम्माननीय मृत्य, तथाकथित स्वच्छा मृत्यु, देह त्याग का स्वत्व इत्यादि सभी आत्महत्या के ही विभिन्न स्वरूप हैं। जो आत्मा को अधोगति की ओर पहुंचाती है अथवा व्यक्ति को नैतिक दृष्ट से अपेक्षाकृत और नीचे गिराती है। इसलिए मानवीय दृष्टिकोण से स्वाभाविक मृत्यु के अतिस्क्त अन्य किसी भी प्रकार की आत्महत्या को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि देह त्याग का स्वत्व पूर्णतः अमानवीय है।

जीवन एक उपहार है, इसे अंगीकार करो।
जीवन एक जुनौती है ,इसे स्वीकार करो।
जीवन एक संघर्ष है, इसका मुकाबवा करो।
जीवन एक लक्ष्य है, इसे प्राप्त करो।
जीवन एक ज्योति है, इसे प्रज्जवलित करो।
इत्यादि –इत्यादि ।

उपरोक्तानुसार पृष्ठांकित प्रेरक प्रसंगों में कहीं भी पलायन करना, त्यागना, भागना, छोड़ना, हटाना, पृथक करना, हिंसा, हत्या इत्यादि शब्दों का प्रयोग नहीं किया गया है। अतएव निर्विवाद रूप से आत्महत्या एक व्यावहारिक शब्द नहीं है।

किसी ने कहा है कि एक चित्रकार जानता है कि उसे अपनी चित्रकारी कहाँ समाप्त करनी है। चित्रकारी अर्थात् चित्र विद्या, चित्र वनाने की कला, चित्रकार का कर्त्तव्य कर्म, चित्रकार का काम अथवा चित्रकार का व्यवसाय। “एक तल या सतह (उक्त आधारभूत सतह मुख्यतः दीवार, पत्थर ,काठ, हाथीदाँत, चमड़ा, कपड़ा, तालपत्र या कागज होती है) पर चाहे वह सम हो या असन, पानी या तेल में घोले हुए अथवा सूखे, एक या अनेक रंग से आलेखन करके आकृति या लम्बाई, चौड़ाई तथा मोटाई दर्शाने को चित्रण कहते हैं।” “दूसरे शब्दों में” किसी समतल धरातल जैसे भित्ति, काष्ठ, फलक आदि पर रंग तथा रेखाओं की सहायता से लम्बाई, चौड़ाई,गोलाई तथा ऊँचाई को अंकित कर किसी रूप का आभास कराना ही चित्रकला है । “चित्रकार अथवा चितेरा मूलतः कलाकार होता है । चित्रकारी वस्तुतः कलाकृति है। कलाकौशल, कारीगरी, कला की चातुरी अथवा निपुणता । यथार्थ में एक चितेरा अथवा चित्रकार अपनी चित्रकारी को कभी समाप्त नहीं करता, अंत नहीं करता अपितु पूरा करता है पूर्ण करता है । एक चित्रकार यह कभी नहीं जानता कि कौन सा चित्र उसका अंतिम चित्र है या फिर किसी चित्र के कौन सा आंगिक चित्रण उसका अंतिम चित्रण है। कोई भी चित्रकार अपनी चित्रकारी की हत्या कभी नहीं करता । यह बात और है कि किसी कारणवश वह अधूरा रह जाए, पर वह उसे पूरा करने की हर संभव यथेष्ट चेष्टा करता ही है। अतएव व्यक्ति को चाहिए कि वह अंतिम क्षण तक जीने के प्रति दृढ़ संकल्पित रहे ।

किसी ने कहा है कि जन्म कुण्डली के अष्टम भाव से मरण का विचार किया जाता है। जब अष्टम भाव में शुभ ग्रहों की स्थिति और दृष्टि होती है तो मृत्यु सुखद होती है। इस भवन में स्थिति अथवा दृष्टि से कभी-कभी राहु अपने प्रभाव द्वारा आत्महत्या-संकल्प-बुद्धि को उत्तेजित करता है। इसके अतिरिक्त कभी-कभी अष्टम भाव में वायु तत्त्व की राशि पड़ने पर भी जातक की विष सेवन अथवा आत्महत्या करने के कारण मृत्यु होती है। ध्यान रहे कभी-कभी, हमेशा नहीं । इसके अलावा कभी-कभी अनेकानेक संघ,पंथ, संस्था,उद्योग-घंधा (विशेषकर कृषि व्यवसाय) से संबंधित लोग तथा कुटुम्ब-परिवार के सदस्यगण भी सामूहिक रूप से आत्महत्या करते जा रहे हैं। हम सबके तत्कालीन परिस्थितियों को देखते हुए सभी आत्महन्ताओं की कुण्डली में उपरोक्त योग था, यह विश्वास करना अपने आप में पूर्णतः संदिग्ध है, क्योंकि उपरोक्त योग वाले जातक आज भी पूर्णतः संतोषजनक स्थिति में जीवन यापन करते हुए पाये जाते हैं।
किसी ने कहा है कि में अपने जीवन का एक सौ चार सावन व्यतीत कर चुकी हूँ। आज मेरे सिर में बाल नहीं है, मुँह में दाँत नहीं है, आखों में रोशनी नहीं है और हाथ-पाँव में बल नहीं है । मेरा शरीर अशक्त है। अब मुझे अपने जीवन यापन के लिए अन्यों का सहारा लेना पड़ रहा है, इसलिए अब मैं जीना नहीं चाहती। आज और अभी से मैं अन्न-जल का परित्याग कर रही हूँ। मुझे मरण को वरण करने का अधिकार दिया जाय। मात्र एक सौ चार वर्ष तक के लिए ही आपके लिए इस धरातल को किसी और ने निर्मित किया, इस आवास को किसी और ने बनवाया, इस परिधान को किसी और ने सिलाई-बुनाई किया, इस अन्न को किसी और ने उत्पन्न किया, इस जल को किसो और ने लाया।-----इत्यादि,इत्यादि । निःसंदेह हम-आप संयुक्त रूप से एक सामाजिक प्राणी हैं । चूँकि हम हिमालय की तराई में नहीं बसते, इसलिए पृथक से हमरा कोई अस्तित्व नहीं । परस्पर सहयोग भाव अथवा परस्पर सहयोग व्यवहार ही हमारा जीवन है। विगत एक सौ चार वर्ष तक हमने सहयोग लिया और आज यह कहना कि अब मैं किसी ओर से सहयोग नहीं लेना चाहती, नितान्त असंगत, अतार्कित और अव्यवहारिक बात है।
**********

विश्वामित्र स्वपच संवाद



महाभारत-5/141 में मन्मर्षि श्रीकष्ण द्वैपायन बादरायण ‘वेदव्यास’ जी के शब्दों को श्री गणेश्वर जी ने लेखनीबद्ध किया है कि त्रेता-द्वापर संधिकाल में बारह वर्षों तक वर्षा हुई ही नहीं। बड़े-बड़े नदियों का जल प्रवाह अत्यंत क्षीण हो गया और छोटी-छोटी नदियां अदृश्य हो गयीं । बड़े-बड़े सरोवर, सरिताएं, कूप तथा झरने श्रीहीन हो गये और छोटे-छोट जलाशय सर्वथा सूख गये। जलाभाव के कारण प्याऊ बंद हो गये। कृषि व्यवसाय चौपट हो गये। अकाल, भूखमरी के कारण क्षुधातुर प्राणी परस्पर घात-प्रतिघात करने लगे। भयानक उपद्रव के कारण त्राहि-त्रहि मच गया। बच्चे-बूढ़े, मवेशी तथा अन्य प्रजाति महामारी के कारण प्रायः विलुप्त हो गये । सर्वत्र हड्डियों के ढेर लग गये। वसुधा का बहुत बड़ा भाग उजाड़ तथा लगभग निर्जन बन गया। फल-फूल, जड़-मूल, वनस्पति तथा औषधियां भी नष्ट हो गयीं। ऐसे भयंकर समय में धर्म का नाश हो जाने के कारण भूख से व्याकुल मनुष्य एक दूसरे का भक्षण करने लगे। सर्वत्र हाहाकार व्याप्त हो गया। भूतल पर यज्ञ और स्वध्याय का लोप हो गया। अग्नि के उपासक ऋषिगण भी यम-नियम और अग्निहोत्र त्याग अपने आश्रम को छोड़कर खाद्यान्न-जल के लिए इधर-उधर भटकने लगे।

इन्हीं दिनों भूखे-प्यासे ब्रह्मर्षि विश्वामित्र अपने गृहस्थ आश्रम को त्यागकर क्षुधा शांति हेतु भक्ष्य-अभक्ष्य कुछ भी ग्रहण करने के विचार से यहां-वहां विचरने लगे । एक दिन वे किसी वनांचल में वधिक एवं हिंसक चाण्डालों की बस्ती में जा पहुंचे । चाण्डाल द्वारा अपने कुटिरों को सर्प की केचुलों की मालाओं से विभूषित एवं चिन्हित किया गया था। अर्थी और मूर्दों के ऊपर से उतारे हुए फूल-मालाओं से विभूषित एवं चिन्हित किया गया था ।अर्थी और मूर्दों के ऊपर से उतारे हुए फूल-मालाओं से उन चाण्डालों के घर सजे हुए थे और वहीं उतारे गये कपड़े चारों ओर फैलायें गये थे उसी बस्ती में घुसकर भूखे ब्रह्मर्षि घर-घर घूमकर भिक्षा मांगने लगे लेकिन फिर भी वहां कहीं भी किसी के भी हाथ से उन्हें अन्न-जल, फल-फूल, जड़-मूल, सूखी मांस-मछली इत्यादि कोई भी खाद्य अथवा अखाद्य पदार्थ उपलब्ध न हो सका। भूखे, थके हारे ब्रह्मर्षि विश्वामित्र अत्यन्त दुर्बलता के कारण लड़खड़ाते हुए ‘श्वपच’ नामक चाण्डाल के घर के सामने धरातल पर गिर पड़े।
महामुनि मन-ही-मन विचार करने लगे कि अब मैं क्या करू ? क्या उपाय किया जाय, जिससे अन्न के बिना भूख के कारण मेरी व्यर्थ मृत्यु न हो सके। इतने में ही उन्होंने देखा कि चाण्डाल के घर में कुछ ही समय पूर्व शस्त्र द्वारा मारे हुए कुत्तें की जांघ के मांस का एक बड़ा भाग पड़ा हुआ है। तब महामुनि ने सोचा कि मुझे यहां से इस मांस की चोरी करनी चाहिए, क्योंकि इस समय मेरे लिए अपने प्राणरक्षार्थ अन्य कोई उपाय नहीं है। शास्त्र का यह निश्चित विधान भी है कि विपत्तिकाल में प्राण रक्षा के लिए ब्राह्मण को श्रेष्ठ, समान तथा हीन मनुष्य के घर से चोरी करना कोई अनुचित बात नहीं। व्यक्ति को पहले हीन पुरुष के घर से भक्ष्य पदार्थ की चोरी करनी चाहिए। यदि वहां से कोई प्राप्ति न हो सके तो अपने समकक्ष व्यक्ति के घर से घाद्य पदार्थ ले लेना चाहिए । यदि वहां से भी अभिष्ट सिद्धि न हो सके तो अपने से विशिष्ट धर्मात्मा पुरूष के यहां से भोज्य पदार्थ की चोरी कर लेनी चाहिए । अतएव इस चाण्डाल के घर से यह कुत्ते की जांघ को चुरा लेनी चाहिए, क्योंकि इस चोरी में मुझे किसी के यहां दान लेने से अधिक दोष नहीं दिखाई दे रहा है। इस कारण अब मैं इसकी चोरी अवश्य करूंगा । ऐसा निश्चय करके महामुनि चाण्डाल के घर के समक्ष ही गली में चूपचाप कमर सीधी करने लगा।

जब प्रगाढ़ अन्धकार से युक्त आधी रात हो गयी और चाण्डाल के परिवार के सभी सदस्य सो गये तब विश्वामित्र धीरे से उठे और चाण्डाल की कुटिया में घुस गये । वह चाण्डाल पूर्णतः निद्रावस्था में नहीं था। श्वान निद्रा में लीन था। वह विश्वामित्र के घुसने की आहट को सुन लिया। साथ ही यथाशीघ्र पलटकर उन्हें देख भी लिया। विकराल स्वरूप और हिंसक, कूर तथा उग्र स्वभाव वाला वह चाण्डाल कड़ककर बोला- “अरे मूर्ख प्राणी। वैसे तो मेरे परिवार के सभी सदस्य सो गये हैं पर मैं सोया नहीं हूं, मैं जाग रहा हूं। तू कौन है तथा क्यों मुझ वधिक के घर में घूसा है? अब निश्चित रूप से अपने आपको तू मारा गया जान।” इस कर्कश घुड़की से डरकर विश्वामित्र का मुखड़ा मलिन हो गया और लज्जा से सर झुक गया। वे कातर स्वर में बोले- “भूखा-प्यासा,दीन-हीन, दुःखित-पीडित,आशक्त-असहाय, उपेक्षित तथा हतोत्साह-मैं विश्वामित्र तुम्हारे घर में घुसकर यह श्वानजंघा ले जाने की चेष्टा कर रहा हूँ ।” श्वपच पूर्व में ही विश्वामित्र के तपोबल, प्रताप और शाप के संबंध में सुन चुका था। वह घबराकर अपनी शय्या से उठा और उनके पास जाकर बड़े आदर के साथ हाथ जोड़कर उनसे कहने लगा – “ब्रह्मर्षे। इस रात के समय आपकी यह कैसी चेष्टा है ? आप यह क्या करने जा रहे हैं ? आप यह क्यों अनर्थ करना चाहते हैं ?”

विश्वामित्र बोले भाई। मैं बहुत भूखा हूं। क्षुधा से मेरी श्रवण शक्ति क्षीण, चेतना शून्य और नाड़ी लुप्त होती जा रही है। मैं दुबला-पतला और निर्बल हो गया हूं और मेरे प्राण शिथिल हो रहे हैं। जिस प्रकार अग्निदेव सर्वभक्षी हैं उसी प्रकार मैं भी सर्वभक्षी बनना चाहता हूं । अब मुझे भक्ष्य और अभक्ष्य में कोई अन्तर दिखाई नहीं दे रहा है। इसलिए मैं यह श्वानजंघा ले जाने आया हूँ । ब्रह्मर्षि । मनीषी पुरूष कहते हैं कि कुत्ता सियार से भी अघम होता है और कुत्ते के शरीरांगों से उसकी जांघ अधम होता है। इस कारण आपने जो निश्चय किया है, यह ठीक नहीं है। चाण्डाल के धनराशि को और उसमें भी विशेष रूप से अभक्ष्य पदार्थ की चोरी धार्मिक दृष्टकोण से अत्यंत निंदित है। अतएव आप धर्म का त्याग न कीजिए । आपके द्वारा धर्मसंकरता का प्रचार नहीं होना चाहिए। आप वेदविहित धर्म से पूर्णतः भिज्ञ हैं । आप धर्मात्माओं में श्रेष्ठ समझे जाते हैं।इसलिए आप अपने जीवन की रक्षा के लिए कोई अन्य श्रेष्ठ उपाय सोचिए।

भाई। भोजन की खोज में इधर-उधर भटकते हुए मेरा एक लम्बा समय व्यतीत हो चुका है, लेकिन फिर भी जावन रक्षा हेतु अब तक कोई निदान मेरे हाथ नहीं लगा है। जो भूख से मर रहा हो, उसे जिस किसी भी उपाय अथवा जिस किसी भी कर्म से सम्भव हो, अपने जीवन की रक्षा करना चाहिए। जिस किसी भी साधन से जीवन सुरक्षित रहे, उसकी अवहेलना नहीं करना चाहिए। मरने से जीवित रहना श्रेष्ठ है, क्योंकि जीवित व्यक्ति पुनःधर्माचरण कर सकता है। जिस प्रकार ग्रहराज सूर्य अस्ताचल के पश्चात समय आने पर पुनः उदित होकर अंधकार का नाश कर देते हैं उसी प्रकार मैं भी विद्या-बुद्धि-विवेक, तप और साधना सिद्धि द्वारा जब अपने आप को सबल और समर्थ कर लूंगा तब सकल अशुभ कर्मों का नाश कर परम पद को प्राप्त कर लूंगा । इसी उद्देश्य से मैने किसी भी देश, काल और परिस्थिति में जीवित रहने का दृढ़ संकल्प लेकर इस अभक्ष्य का भी भक्षण करने का निर्णय समझ- बूझकर लिया है। इसलिए तुम्हें भी इसका अनुमोदन करना चाहिए।

ब्रह्मर्षि । कुत्ता द्विजों के लिए अभक्ष्य है। अतः अभक्ष्य-भक्षण की ओर आपका चित्त नहीं जाना चाहिए । इसका भक्षण कर कोई दीर्घायु प्राप्त नहीं कर सकता । इससे न तो प्राणशक्ति प्राप्त होती है और न ही अमृत के समान तृप्ति होती है। इस कारण आप कोई अन्य भिक्षा मांगने की ओर प्रवृत्त हों । भाई। सारे देश में भीषण अकाल पड़ा हुआ है। इधर भूख से मेरा अंतकाल सन्निकट है। मेरे पास किसी प्रकार की कोई धनराशि भी नहीं जिससे मैं खाद्य पदार्थ क्रय कर सकूं । पर्याप्त समय तक भिक्षाटन करने के उपरान्त भी सूखे मांस-मछली तक प्राप्त करने में मैं पूर्णतः असमर्थ रहा हूं। मैं बिल्कुल निराश्रय, निराश, अशक्त और थकाहारा हूं । मैं यह समझने के लिए विवश हूं कि मुझे श्वान मांस भक्षण में ही षड् रस भोजन का आनन्द भली-भांति प्राप्त होगा ।

ब्रह्मर्षि । ब्राम्हण, क्षत्रीय और वैश्य के लिए केवल पांच प्रकार के पंचनखा प्राणी ही विपत्तिकाल में भक्ष्य बताये गये हैं। यदि आप वेद को प्रमाण मानते हैं तो इस अभक्ष्य पदार्थ की ओर मन को गति प्रदान मत कीजिए । भाई । श्वान और मृग दोनों ही पशु होने के कारण समान हैं । जीवात्माओं में भेद करना उचित नहीं । भूखे महर्षि अगस्त ने भी तो वातापि नामक दानव का भक्षण किया था । मैं भी तो भूखमरी के कारण भारी विपत्ति में पड़ गया हूं। इसी कारण श्वानजंघा को भी मैं पवित्रभोजन के समान ही खाद्य पदार्थ मानता हूं । ब्रह्मर्षि । महर्षि अगस्त ने ब्राम्हणों की रक्षा के लिए विशेष प्रार्थना करने पर विशेश परिस्थिति में ही वातापि राक्षस का भक्षण किया था । इससे वहुत से ब्राम्हणों की रक्षा हो गयी थी अन्यथा वह असुर उन सब ब्राह्मणों को कच्चा चबा जाता । वेदज्ञ गुरू होते हैं । अतएव हर संभव उनकी तथा उनके धर्म की रक्षा करनी चाहिए । इस कारण महर्षि का वह कर्म वस्तुतः धर्म ही थ । भाई । यदि महर्षि अगस्त ने ब्राम्हणो की रक्षा के लिए वह कार्य किया था तो में भी इस ब्राम्हण (वेदज्ञ राजर्षि) शरीर की रक्षा के लिए यह कार्य करुंगा । यह ब्राम्हण शरीर ही इस भव सागर में मेरे लिए परम प्रिय तथा आदरणीय है। इसी को जीवित रखने के लिए मैं यह श्वानजंघा ले जाना चाहता हूं ।

ब्रह्मर्षि । विद्वान पुरूष अपने प्रणों का परित्याग भले ही कर दें, लेकिन फिर भी वे कभी अभक्ष्य–भक्षण का विचार नहीं करते । प्राण का परित्याग करके भी वे अपनी सम्पूर्ण कामनाओं को प्राप्त कर लेते हैं । अतः आप भी उपवास द्वारा ही अपनी मनोकामना की पूर्ति कर लीजिए । भाई । यदि उपवास करके प्राण दे दिया जाय तो मरने के बाद क्या होगा ? यह संदेहास्पद बात है, किन्तु निःसंदेह आशा करने से पुण्य कर्मों का विनाश होगा, क्योंकि शरीर ही धर्माचरण का मूल है। मैं जीवन रक्षा उपरान्त पुनः प्रतिदिन नियमित रूप से शम, दम, व्रत, तप इत्यादि द्वारा संशययुक्त कर्मो का प्रायश्चित कर लूंगा । विद्यमान परिस्थिति में तो इस शरीर की रक्षा करना ही धर्म का मर्म है । वेद विहित तथा धर्ममूलक है । धर्म के मूल अर्थ के स्त्रोत, कर्म के कारक, काम के उपभोक्ता और ज्ञान तथा मोक्ष प्राप्ति के साधन इसी शरीर की सुरक्षा में ही पुण्य है, यह बात स्वतः स्पष्ट हो जाती है । प्रत्यक्ष को प्रमाण की क्या आवश्यकता ?

ब्रह्मर्षि । में तो आपका हितैषी बनकर ही यह धर्माचरण की सलाह दे रहा हूं । जो अयोग्य स्थान से, अनुचित कर्म से तथा निंदित पुरूष से कोई निषिद्ध वस्तु लेना चाहता है, उस विद्वान को उसका सदाचार ही वैसा करने से रोक सकता है। आपको तो ज्ञानी और धर्मात्मा होने के कारण स्वतः ऐसे निंदित कर्म से दूर रहना चाहिए । यदि प्राण देने की अपेक्षा अभक्ष्य-भक्षण ही श्रेष्ठ है तब तो आपके विचार से न वेद प्रमाण है, न धर्म और न ही श्रेष्ठ पुरूषों के आचार-विचार । जहां तक मैं समझता हूं जो श्वानजंघा को भक्षणीय बताकर उसका आदर करे उसके लिए इस संसार में कोई भी वस्तु त्याज्य नहीं है। भाई। विपत्ति काल में एक बार किये हुए किसी सामान्य दुष्कर्म से किसी के जीवन भर किये हुए पुण्य कर्म का नाश नहीं होता। यद्यपि अभक्ष्य-भक्षण निषिद्ध कर्म हौ ताथापि महापातक नहीं । अभक्ष्य-भक्षक को ब्रह्महत्या आदि के समान महापाप लगता हो ऐसा कोई शास्त्रीय वचन नहीं है। हाँ मद्यप को महापाप लगता है ऐसा शास्त्र वाक्य स्पष्ट रूप से उपलब्ध होता है । इसलिए मद्यपान अवश्य त्याज्य है । मैं अपने धर्म को जानता हूं । तुम्हें धर्मोपदेश देने का कोई अधिकार नहीं है । जैसे मेढ़कों के टर्र-टर्र करते रहने पर भी गौएं जलाशयों से जल पीती ही हैं । वैसे ही तुम्हारे बारम्बार मना करने कर भी मैं तो यह अभक्ष्य-भक्षण करुंगा और उपवास रहकर प्राण नहीं त्यागूंगा । यदि तुम मेरे हितैषी हो तो इस विपत्ति से मेरा उद्धार करो । तुम यह श्वानजंघा मुझे दे दो ।

ब्रह्मर्षि । मैं महान पापी तथा ब्राह्मणेतर होने पर भी आपको बारम्बार उलाहना दे रहा हूं वास्तव में इस प्रकार धर्म का उपदेश देना मेरे लिए धूर्ततापूर्ण चेष्टा ही है । आप बारम्बार अत्यन्त आग्रह करके श्वानजंघा भक्षण करने जा रहे हैं इसलिए इसका जो भी दण्ड होका आप ही को सहन करना पड़ेगा । इसमें मेरा कोई दोष नहीं है । आप स्वेच्छा से यह श्वानजंघा ले जाइये । ऐसा कहकर श्वपच ब्रह्मर्षि को मना करने के कार्य से निवृत्त हो गया । जीवित रहने की दृढ़ इच्छा शक्ति वाले ब्रह्मर्षि तो उसे लेने का निश्चय पूर्व में ही कर चुके थे । इस कारण वे उसे ले ही गये । इसी बीच उनके मन में यह विचार उठा कि में श्वानजंघा को विधिपूर्वक पहले देवताओं को अर्पण करूंगा, और उन्हें संतुष्ट करने के उपरान्त अपनी इच्छानुसार उसे खाऊंगा । ऐसा सोचकर ब्रह्मर्षि ने वेदोक्त विधि से अग्नि की स्थापना कर स्वयं ही चरु पकाकर तैयार किया । तदुपरान्त अग्नि आदि देवताओं का आवाहन करके उनके लिए क्रमशः विधिपूर्वक पृथक भाग ज्यों ही अर्पित किया त्यों ही देवयोग से बड़ी भारी वर्षा के साथ ही साथ खाद्यान्न, फल-फूल, जड़-मूल, औषधियां उत्पन्न हो गयीं और समस्त जीव-जन्तु तथा जन-समुदाय को जीवनदान मिल गया । ब्रह्मर्षि दीर्घकाल तक निराहार व्रत एवं तपस्या करके अपने सारे पाप दग्ध कर ही चुके थे । इस कारण तत्समय उन्हें अत्यन्त अद्भुत सिद्धि प्राप्त हुई । उन ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने विधि पूर्वक समर्पण कर्म करके उस हविष्य का आस्वादन किये बिना ही समस्त देवताओं को संतुष्ट कर दिया और उन्हीं की कृपा से पवित्र भोज्य पदार्थ प्राप्त करके उसके द्वारा अपने जीवन की रक्षा की । अतएव मानव मात्र को दीनचित्त न होकर प्रत्येक देश, काल और परिस्थिति में सदैव जीवित रहने का भरसक प्रयत्न करना चाहिए, क्योंकि जीवित रहने वाला व्यक्ति ही पुण्य कर्म का अवसर पाता है और कल्याण कारी कर्मफल का भागीदार बनता है ।
**********

गमनागमन


(विदेश से सदेह की ओर)

वनांचल स्थित एक तावाब के निकट एक छोटा सा गाँव बसा था। उस गाँव में एक छोटा सा कृषक परिवार निवास करता था। सास-ससुर और बेटा-बहु बस कुल चार सदस्य। सास का नाम ‘रमा’, ससुर का नाम नरेश, बहु का नाम दिव्या और बेटा का नाम राजेश था । खेती-किसानी की दृष्टि से सास-ससुर दोनों थक चुके थे ! या यों कहें कि श्रम –परिश्रम की दृष्टि से दोनों सेवा-निवृत्त हो चुके थे। लेकिन सास की जबान अब तक नहीं थकी थी। उसकीजबान कैंची की तरह जबरदस्त चलती थी। विशेष कर बहु पर तो और भी अधिक तेज रफ्तार से । जहाँ तक खेती-किसानी का प्रश्न है सास-ससुर के स्थान पर बेटा-बहु प्रतिस्थापित हो चुके थे।

राजेश रोजाना सूर्योदय पूर्व अपनी कर्मभूमि खेत की ओर चल पड़ता था और सूर्यास्त पश्चात घर वापस आता था। खेती गाँव से काफी दूर था इसलिए बार-बार आने-जाने में उसे असुविधा होती थी इसी कारण वह केवल सुबह जाता था और साँझ ढले वापस आता था। इस बीच दिव्या रोजाना दो बार पूर्वान्ह जलपान और मध्यान्ह भोजन पहुँचाने खेत जाती-आती थी । इसके अतिरिक्त दिव्या को घर के सारे काम करने पड़ते थे। इसके बावजूद दिव्या को उपहार स्वरूप सास की अनेकानेक सीख सीखनी पड़ती, बर्तन-भाड़, मँजाई-धुलाई, सास-ससुर को नहलाना-धुलाना, कपड़ा-लत्ता धोना रँधाई-कुटाई इत्यादि-इत्यादि घर के सारे काम दिव्या के ही सिर पर । उपर से यदि कोई ठीकरा फोड़ना हो तो वह भी दिव्या के ही सिर पर । इतना ही नहीं, और भी; क्रमशः अधिकाधिक। विशेषकर सास की साफ-सुथरी छबि बहु की पूर्व निर्धारित समय-सारिणी पूर्णतः ध्वस्त कर देती थी। यहाँ भाड़ू ठीक से नहीं लगा, वहाँ की लिपाई ठीक से नहीं हुई, यह बर्तन ठीक से साफ नहीं हुआ, वह कपड़ा ठीक से नहीं धुला आदि-आदि । इसका सीधा-सादा अर्थ यह है कि लगभग प्रत्येक काम को दोबारा करना। इस भागमभाग जीवन में सम्पूर्ण घर का काम केवल एक व्यक्ति द्वारा सिर्फ एक बार ही कर लेना ही जी का जंजाल है तब फिर उन्हीं काम को दोबारा करना तो अति है ही। अत्यन्त कष्टप्रद, भारी तकलीफ देह, घुटन भरी जीवन लेकिन क्या करे बेचारी ? इसलिए यही उसकी गति और यही उसकी नियति; यही उसकी जिन्दगी और यही उसकी बंदगी।

दिव्या अपने पति राजेश के साथ कृषि कार्य करने के लिए तीसरी बार दोपहर पश्चात खेत जाया करती थी। तीन-तीन बार खेत आने जाने में काफी समय बर्बाद हो जाता था। इसका दुष्प्रभाव कृषि कार्य पर पड़ता था। कृषि कार्य में राजेश अन्य ग्रामीण भाइयों से पिछड जाता था। इस कारण उसने अपनी पत्नी से कहा कि आज के बाद तुम मेरे लिए मध्यान्ह भोजन लाने के साथ-ही –साथ तुम्हारे लिए भी मध्यान्ह भोजन लेते आना। हम दोनों मध्यान्ह भोजन साथ-साथ लेंगे। कम से कम एक बार आने-जाने के समय का बचत करके हम उस समय का सदुपयोग कृषि कार्य में करेंगे और ऐसा करके हम कृषि कार्य विषयान्तर्गत अन्य ग्रामीण भाईयों के साथ-साथ चलेंगे । तुम सूर्यस्त से एक घंटा पूर्व घर चली जाना और घर का काम काज करना। इस सद्-बुद्धियुक्त समय-सारिणी को पत्नी भी मंजूरी मिलते देर नहीं लगी। इस प्रकार दोनों राजी-खुशी से अपना जीवन निर्वाह करने लगे।

इधर सास को यह दिनचर्या मंजूर नहीं। पूरा-पूरा चार घंटा वह भी मात्र दिन के समय में पति के साथ गुजारना सास को गँवारा नहीं हुआ। कतई नहीं। हरगिज नहीं । एक दिन बहु सूर्यास्त से लगभग एक घंटा पूर्व उस दिन के लिए अनावश्यक कृषि साज-सामानों अथवा कृषि औजारों को लेकर घर पहुँची सास के मुँह में तो पूर्व से ही खुजली हो रही थी । वह आग बबूला हो गयी।उसने अपना भड़ास निकाली। आव देखी न ताव और कहा-यहाँ सब काम अधूरा छोड़कर पति के साथ रंगरलिया मनाने खेत चली जाती है। यहाँ घर का काम कौन करेगा ? एक नौकर रखकर जाना अपने ससुर के लिए, जो मेरे काम में भी हाथ बटायेगा और एक नौकरानी छोड़ आना अपने पति के लिए जो मेरे बेटे के काम में हाथ बटायेगी और सून ! इन दोनों का भुगतान तुम्हारा बाप करेगा । यहाँ यह साफ नहीं वह साफ नहीं । दाल गीली। भात में बजरी। रोटी अधपकी। सब्जी रख छोड़ी ही नहीं। सब खा गयी । ठीक से काम नहीं करना है और केवल खाना-पीना है तो चली क्यों नहीं जाती अपने बाप के घर या फिर चुलू भर पानी में डूबकर मर क्यों नहीं जाती है।

सास के समक्ष दिव्या की जुबान हिलती तक नहीं थी। बोलना तो कोसों दूर की बात है। वह मन मसोस कर रह गयी । वैसे अन्दर ही अन्दर उसके हृदय में क्रोधग्नि भभक रही थी। उसके आँखों के सामने अँधेरा छा गया था। वह उल्टे पाँव घर से बाहर निकली। उसे कहाँ जाना है स्वयं को मालूम नहीं था। लेकिन चल रही थी। रास्ता नापते-नापते उसे एक तलाब दिखा। उसे सास की कही चुलू भर पानी में डूब मरने वाली बात याद आई । वह तालाब किनारे अपना बोझा उतारी और पानी में प्रवेश की । पता चला कि पूरे तालाब में कहीं भी घुटनों से अधिक पानी नहीं। चुलू भर पानी में डूब मरने सन्बन्धी फार्मूला से वह अनभिज्ञ थी अब वह वापस आयी अपने बोझा के पास । उसमें उसे नागर का जोतार भी दिखा। जोतार अर्थात् हल के जुड़े से बैलों के गले को बाँधने वाली रस्सी । इसे वह उस दिन के लिए अकाम कृषि औजारों के साथ खेत से लेकर आयी थी। वह उस बोझा को ढोते हुए पुनः राह नापते आगे बढ़ी । आगे उसे एक बड़ा वृक्ष दिखा। उस पेड के नीचे वह अपना बोझा उतारकर एक पत्थर पर बैठ गई। वहाँ वह उस जोतार को निकाली और फँसियाने के लिए रस्सी तैयार करने लगी। बाप दिन में तो वह कभी फाँसी चढ़ी नहीं है। वह क्या जाने फाँसी के लिए रस्सी तैयार करना । इधर पेड़ की डगाल भी ऊँची थी। रस्सी फेंकती थी । रस्सी डगाल को छूकर गिर जाती थी। पुनः प्रयास करती थी। रस्सी डगाल को छलांग लगाकर गिर जाती थी। बार-बार प्रयास, बार-बार असफलता । थक-हार कर एक बड़े से पत्थर में बैठ गई और इत्मीनान के साथ फाँसी बनाने के लिए रस्सी को इधर-ऊधर आड़ा-तिरछा घुमाने लगी। वह अपने कार्य में इतना निमग्न थी कि आस-पास क्या कुछ हो रहा है इसका उसे कोई भान नहीं थी।

उसके इस क्रिया-कलाप को सामने से आया हुआ एक ढोलकिया देख रहा था और भाँप रहा था कि वह क्या करने जा रही है। बुजुर्ग होने के नाते उसे यह भाँपते देर नहीं लगी कि वह क्या करने जा रही है। उसी गाँव का होने के नाते वह उसे नाम से भी और परिवार से भी पहचान रहा था। इनकी सास-बहु की लड़ाई ग्राम विख्यात थी तो इससे वह भी अनभिज्ञ नहीं था। वह ढोलकिया जिसका नाम थनवार था जान गया कि दिव्या फाँसी चढ़ने आयी है। थनवार बाप-दादा के जमाने से चोर-लुटेरा था सजायाफ़्ता था। स्थानीय थानेदार तथा अन्य पुलिस और न्यायलयीन अधिकारी कर्मचारी इसके नाम से भलीभाँति परिचित थे। जब उसने देखा कि गले में सोने की चैन और शरीरांग बेचैन है; कमर में करधन और करों में डोरी की उलझन है तब उसके मुँह में पानी आ गया । टपकते लार को सम्भालते हुए बड़ी मीठी बोली बोला-बेटी दिव्या। तू अकेली यहाँ बैठकर क्या कर रही है; क्यों बैठी है ? तुम्हारा इरादा क्या ? प्रश्नों की झड़ी सुनकर एक बार तो झिझकीं। हड़बड़ाई; किन्तु अविलम्ब सम्भलकर एक साथ बेधड़क सभी प्रश्नों का जवाब दे दी। मैं फाँसी का फंदा बना रही हूँ। मैं फाँसी लगाने के लिए बैठी हूँ । मेरा इरादा केवल फाँसी लगाना है। तो फाँसी क्यों नहीं लगा रही है ? पूछने पर बोली कि मुझे फाँसी लगाना नहीं आता । थनवार ने बड़े उतावले के सात कहा मैं बताऊँ । दिव्या ने भी बड़ी जल्दीबाजी में बोल दी-हाँ बताओ।

थनवार दिव्या से रस्सी लिया डगाल के नीचे उबड़-खाबड़ जमीन के नीचे अपने बड़े भारी ढोल को खड़ा रखा । ढगमगाते ढोल के ऊपर सम्भलकर धीरे-धीरे चढ़ा। दोनों जोतार को एक किया. एक छोर को डगाल से बाँधा और दूसरे छोर को फाँसी का फंदा बनाया। अपने गले को फाँसी के फंदे में डालते हुए कहा कि ऐसे इस फंदे में अपने गले को डाल देना और ऐसे इस प्रकार पैर से ढोल को उसके स्थान से हटा देना। जुबान से इन शब्दों के उच्चारित होने के साथ ही इनके दोनों पैर अनजाने में ऐसे ही हरकत कर बैठे और इनके पैरों तले ढोल खिसक गया। लुढ़कते हुए ढोल काफी दूर चला गया । इधर थनवार तरीका बताते-बताते खुद फाँसी के फंदे पर झूल गया। उसका शरीर बड़ी बेदर्दी के सात छटपटाने लगा। मुँह से कोई आवाज तक नहीं निकली । उस दरमियान कुछ समय के लिए दोनों हाथ ऊपर की ओर उठे तो सही किन्तु दुर्भाग्यवश गले तक पहुँचकर लुढ़क गए । इतना अधिक दर्दनाक छटपटाहट कि पेड़ के इस डगाल के साथ जुड़े अन्य डगाल भी हिलने लगे। सभी सूखे पत्ते झड़ गए और थनवार निष्प्राण हो गया । इतना हृदय विदारक छटपटाहट, इतना दर्दीला दृश्य इससे पूर्व दिव्या ने कभी नहीं देखा था। पहली दफा उसे यह ज्ञात हुआ कि फाँसी पर चढ़ने से इस कदर कष्ट झेलना पड़ता है। उसने सोचा इससे तो लाख गुनी अच्छी है सास की प्रताड़ना। उसका पूर्णतः हृदय परिवर्तन हो गया । उसने निर्णय लिया कि अब कभी भी वह फाँसी पर नहीं चढ़ेगी। इसके अतिरिक्त अन्य किसी साध से भी आत्महत्या नहीं करेगी ।

अब नहीं मरूँगी,अब नहीं मरूँगी कहती-कहती; दहाड़ मार-मार कर; गला फाड़-फाड़कर रोती-चिल्लाती सब कुछ छोड़-छोड़कर बड़ी तेज रफ्तार के साथ दौड़ी चली आई अपना घर और सास के गले में अपना गला मिलाकर जोर-जोर से अपनी सारी दुखड़ा रोने लगी; साथ में वही। शब्द मैं नहीं मरूँगी, मैं नहीं मरूँगी। सास हक्का-बक्का रह गयी । बहुत देर तक बहु के घर वापस नहीं आने के कारण वह भी पूर्व से ही किसी अनहोनी के भय से काँप रही थी। बहु की इस क्रिया-कलाप से स्वयं तो आश्वस्त हुई कि चलो बहु ठीक-ठाक तो घर वापस आ गई। यदि कोई उल्टी–सीधी बात हो जाती तो मुफ्त में मैं मारी जाती । उसे अपनी बहु से कही हुई बात याद आयी कि “चुल्लू भर पानी में डूबकर मर क्यों नहीं जाती ?” यदि वास्तव में पानी डूबकर मर जाती तो उसे जेल की चक्की पीसनी पड़ती। उसकी बहु ने आज उसे जेल जाने से बचा लिया। उसने सोचा कि मेरी बहु ने आज न सिर्फ इस घर के इज्जत को नीलाम होने से बचाया बल्कि मेरे बाप-दादा के इज्जत को भी नीलाम होने से बचाया है। उसने निर्णय लिया कि वह आज के बाद बहु की इस कृपा के प्रति आजीवन कृतज्ञता प्रकट करती रहेगी। सास रमा का पूर्णतः हृदय परिवर्तन हो गया।अब वह बहु को ढाढ़स बंधाने लगी कि तुम्हें कौन कहता है मरने को ।मरे तेरे दुश्मन । हम क्यों मरेंगे। हम नहीं मरेंगे अब चुप हो जा। शान्त हो जा। निश्चिन्त हो जा अब तुम्हें कुछ नहीं होगा । मैं हूँ ना। यह दौड़ने–भागने, रोने-चिल्लाने का दृश्य जिन-जिन ने भी देखा-सुना उन सभी ने सीधा नरेश के घर की ओर डगर भरा। बिन बुलाये नरेश के घर पहुँच कर देखने लगे तमाशा।

काफी देर व्यतीत होने के बाद दिव्या धीरे-धीरे शान्त हुई। कुछ सुनने–सुनाने लायक हुई। उपस्थित उन तमाम जन समुदाय से वह अपनी आप-बीती कह सुनाई । उपस्थित उन सभी ने उसी समय स्थल निरीक्षण किया और दिव्या के कथन को पूर्णतः सत्य पाया। गाँव के कोटवार ने निकट के थाने में रिपोर्ट दर्ज करवाया। थानेदार ने निकट के महिला थाने में इस घटना की सूचना दी। महिला पुलिस ने दिव्या को गिरफ्तार लिया । दिव्या को विचाराधीन कैटी के रूप में महिला पुलिस हिरासत में रखी । अगली सुबह न्यायालय में प्रकरण प्रस्तुत किया गया। प्रकरण काफी दिनों तक चला। मृतक थनवार सज़ायाफ़्ता होने के कारण साथ ही अन्य अनेक प्रकरण उसके नाम आज भी न्यायालय में लम्बित रहने के कारण जन धनराशि हड़पने के उद्देश्य से उसके द्वारा किये गये इस करतूत को एक तो अन्य की हत्या का प्रयास करने का अपराधी और दूसरा ‘आत्महत्या’ का दोषी प्रमाणित हुआ। स्वयं मृत्यदण्ड भुगतने के कारण न्यायालय उसे कोई सजा नहीं सुनाई गई। बहु दिव्या द्वारा अपराध स्वीकार कर लेने ,प्रत्यक्षदर्शी एक मात्र गवाह होने; ‘आत्महत्या’ करने सम्बन्धी अपनी पलायन वादी विचारधारा को त्यागने और भविष्य में कभी भी ‘आत्महत्या’ न करने की शपथ लेने के कारण अपने स्वयं की इस जीवन रक्षा को देश, समाज और परिवार की एक काम-काजी महिला की जीवन रक्षा मानते हुए उसके तमाम गुनाहों को माफ करते हुए अदालत ने उसे बाइज्जत बरी कर दिया ।
***********

उपसंहार



निद्रा का अभिप्राय नींद होता है, जिसमें मन की गतिविधियाँ रूक जाएँ, मन निष्क्रिय हो जाए अर्थात् सुख, चैन व शांति के साथ अत्यन्त आराम तलब गहरी नींद को निद्रा कहते हैं । यदि हम सपने देख रहे हैं तो फिर हम निद्रा की स्थिति में नहीं स्वप्न की स्थिति में ही हैं। स्वप्न की स्थिति वास्तव में जाग्रत अवस्था और सुषुप्त अवस्था के बीच की स्थिति होती है। इस बीच की स्थिति में न तो हम ठीक से जाग रहे होते हैं और न ठीक से सो रहे होते हैं। जब हम सोने की कोशिश करते हैं तब हमें पहले झपकी आती है, जिसे तन्द्रा कहते हैं। यह जागरण से निद्रा में प्रवेश करने से पहले की अवस्था होती है। इसमें हम अधजगे से तथा अधसोये से रहते हैं। जब हम जाग्रत अवस्था की समाप्ति तथा निद्रा अवस्था के प्रवेशद्वार पर होते हैं तब हम स्वप्न की स्थिति में होते हैं। तन्द्रा अधजगी स्थिति में स्वप्न वाली स्थिति है और स्वप्न अधसोई स्थिति की तन्द्रा होती है, न स्वप्न होते हैं और न मन । मन के न होने से हमें अपने आपके होने का ख्याल नहीं रहता, क्योंकि ख्याल तभी रहते हैं जब मन सक्रिय रहता है। ख्याल करने का ही नाम मन है। मन नहीं तो ख्याल नहीं या फिर यों कहें कि ख्याल नहीं तो मन नहीं । हम जब गहरी नींद सोकर जागते हैं तब स्फूर्ति तथा तरो-ताजगी का अनुभव करते हैं। मन की इस चौथी वृत्ति निद्रा के अनुसार उचित समय पर उचित अवधि तक गहरी नींद सोना शरीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है।

जन्म का प्रयोजन गर्भ से निकलकर जीवन धारण करना अथवा अस्तित्व में आना, उत्पत्ति आविर्भाव या पैदाईश होता है और ‘आत्महत्या’ का दुष्प्रयोजन होता है-पूर्णायु से पूर्व अनुचित तरीके से अपने आप को मार डालना । मृत्यु का आशय पूर्णायु पश्चात् विधाता द्वारा निर्मित विधि से प्राणों का शरीर से निकल जाना है और पुनर्जन्म का तात्पर्य है मरने के बाद फिर से दूसरे शरीर में जन्म ग्रहण करना या पुनः दूसरा शरीर धारण करना । अतएव तलनात्मक दृष्टिकोण से हम तन्द्रा को जन्म,स्वप्न को ‘आत्महत्या’ या प्रेतयोनि, निद्रा को मृत्यु और जागरण को पुनर्जन्म की अवस्था कह सकते हैं।

एक प्रकार से शरीर आत्मा का कारावास है। एक नियत काल तक कारावास की सजा प्राप्त कैदी यदि इस बीच कैदखाने से भाग जाता है तो वह कारागृह से मुक्त नहीं हो जाता, वह कारावास के नियमों को नष्ट करने के चक्कर में इधर-उधर जहाँ कहीं भी भटकता रहता है, उसे सभ्य समाज का कोई भी व्यक्ति व परिवार आश्रय नहीं देता । जब वह दुबारा पकड़ा जाता है तब उसे अपने पूर्व प्राप्त सजा के साथ ही जेल के नियमों को तोड़ने के एवज में नियमानुसार और अतिरिक्त सजा साथ-साथ भोगने हेतु अपेक्षाकृत और अधिक कष्टप्रद कारागृह की कालकोठरी में डाल दिया जाता है।

जब मनुष्य ‘आत्महत्या’ करता है तब उसकी आत्मा कुछ समय बाद चैत्य लोक अथवा चैत्यतरू (पीपल, अशोक या फिर अन्य कोई वृक्ष) में जाकर तब तक विश्राम करती है, जब तक कि मृत्युलोक पर एक दूसरे शरीर में जन्म लेने का समय नहीं आ जाता। इसी को प्रेतयोनि भी कहते हैं शरीर व्यक्ति के लिए एक अद्भुत दुर्ग है, जो सूक्ष्म शरीर को अन्य लोकों में निवास कर रहे विभिन्न प्राणियों के कूर व कठोर आक्रमणों से बचाता है। एक बार शरीर से बाहर जाते ही आत्मा के लिए एक भयानक खतरा उत्पन्न हो जाती है, जिसमें सम्भव है कि वह दीर्घकाल तक भटकती ही रहे।

हमारी आत्मा कुछ निश्चित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए, कुछ विशिष्ट अनुभवों की प्राप्ति के लिए, कुछ सीखने व कुछ प्रगति कर गुजरने के लिए इस मृत्युलोक में आती है। उस नियत कार्य को पूरा करने से पहले यदि कोई व्यक्ति अपने शरीर को नष्ट कर देता है तो उसे अपेक्षाकृत और अधिक बुरी देश, काल और परिस्थितियों के साथ उस नियत कर्म की निष्पत्ति तक उसे बारम्बार जन्म लेना पड़ता है, जिससे छुटकारा पाने के लिए उसने ‘आत्महत्या’ का रास्ता अपनाया था। दूसरे शब्दों में ‘आत्महत्या’ करने का फल उन्हीं कठिनाईयों को अपेक्षाकृत और अधिक प्रतिकूल तथा नकारात्मक परिस्थितियों में पुनः प्राप्त करना है, जिन कठिनाईयों को उसने पूर्व जीवन-काल में हल नहीं किया था। पुनः-पुनःअन्यान्त जीवन में इसी धरती पर बारम्बार लौटकर उसे इन कठिनाईयों के बोझ को ढोना ही पड़ता है। अवरोधक को पार करने के उपरान्त ही जीवन-चक्र अपनी मंजिल की ओर गतिमान होता है।

हम वचनबद्ध हैं कि परम पिता परमात्मा द्वारा प्रदत्त प्रत्येक क्षण का सदुपयोग करने के लिए ।अथक परिश्रम और घोर तपस्या प्राप्त 84 लाख योनियों में से सर्वोत्त्म मानव तन को त्यागकर किसी व्यक्ति विशेष, परिवार समाज, संघ, दल या देश विशेष को फायदा पहुँचना तो बहुत दूर की बात है, हम स्वयं के साथ भी न्याय नहीं कर पाते। हम स्वर्ग में ही नहीं नरक में भी प्रवेश से वंचित हो जाते हैं। हम नरक लोक से भी वीभत्स उस प्रेत लोक में प्रवेश पाते हैं जहाँ स्वरोपित वृक्ष के अलावा अन्य पेड़-पौधे अरनी छाया तले क्षण मात्र भी विश्राम करने की इजाजत नहीं देते । इस पेड़ से उस पेड़, इस डगाल से उस डगाल भटकने वाली प्रतात्मा की छबि किसी भी आईने में स्पष्ट रूप से उभर नहीं सकती । रूप चाहे जैसा भी हो, मानव मुखड़ा भूत-प्रेत से उज्जवल तो होगा ही। इसलिए तरीका चाहे जो भी हो ‘आत्महत्या’ अशोभनीय ही नहीं गृणित भी है। इसके अतिरिक्त लक्ष्य प्राप्ति तक या फिर पूर्णायु तक इन्हीं समस्याओं के साथ बारम्बार पुनर्जन्म तय है तब हम कुल कितने बार नींद की गोली खायेंगे ? कभी न कभी तो जहर का प्याला कड़ुआ बनेगा ही। तो फिर इसी जन्म में इसी शरीर और इसी न्यायालय से न्याय प्राप्त करने में क्या बुराई है ?

सर्वविदित है कि समय को संस्कृत में काल एवं अंग्रेजी में टाइम कहते हैं। वह संबंध सत्ता, जिसके द्वारा भूत, वर्तमान और भविष्य की प्रतीति होती है उसे काल कहते हैं। काल का शाब्दिक अर्थ होता है समय, अवधि, अवसर, मौका, मृत्यु, अंतकाल, यमदूत, यमराज आदि। समय के उलट-फेर को ही काल चकक्र के नाम से संबोधित करते हैं। यहां यह प्रासंगिक है कि काल गणना के अनुसार एक चक्रयुग अथवा एक महायुग में चार युग होते हैं। तदनुसार सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग की आयु क्रमशः 1728000, 1296000, 864000 और 432000 वर्ष है। ईसा पूर्व 3100 से कलियुग प्रारम्भ हुआ है और वर्तमान ईसवी सन् 2007 चल रही है। अर्थात कुल मिलाकर मात्र 5106 वर्ष कलियुग बीता है और अभी 426894 वर्ष शेष है।

जिस युग में राजा दण्डनीति का शत-प्रतिशत याने सौ प्रतिशत क्रियान्वयन करता है उसे सतयुग कहा जाता है। इस युग में सत्य की अपने आप विजय होती है। इस युग में शत प्रतिशत खाद्यान्न स्वतः उत्पन्न होते हैं इसलिए सौ प्रतिशत उत्पादन को कुल उत्पादन माना जाता है। जिस युग में राजा दण्डनीति के तीन चौथाई अथवा तीन बंटे चार (3/4) अंशों का क्रियान्वयन करता है, उसे त्रेतायुग कहते हैं। इसमें सत्य पर विजय प्राप्त करने के लिए संघर्ष भी करना पड़ता है। इस युग में जोतने-बोने मात्र से ही तीन चौथाई खाद्यान्न उत्पन्न होते हैं। इसलिए 75 प्रतिशत उत्पादन को कुल उत्पादन मान लेते हैं। जब राजा दण्डनीति के दो चौथाई अथवा एक बटे दो (2/4या ½) भाग का क्रियान्वयन करता है तब उसे द्वापर युग के नाम से सम्मानित किया जाता है। इस युग में सत्य संदिग्ध हो जाता है। राज्य दो भागों में विभक्त हो जाता है। कपट की विजय होती है और खून की नदियां बहाने के बाद अंततः सत्य की विजय होती है। इसमें जोतने-बोने, सामयिक मेहनत और पर्याप्त श्रम के बाद भी दो चौथाई खाद्यान उत्पन्न होता है, इसलिए 50 प्रतिशत उत्पादन को ही कुल उत्पादन मानना पड़ता है। जब राजा समूची दण्डनीति का परित्याग कर अयोग्य उपायों द्वारा प्रजा को कष्ट देने लगता है तब उसे कलियुग का नाम दिया जाता है। इस युग में सत्य विलुप्त हो जाता है और दसों –दिशाओं में झूठे, धोखेबाज तथा नालायकों का साम्रांज्य स्थापित हो जाता है। इस युग में लाख प्रयत्न करने के बाद भी सत्य की विजय नहीं होती । सत्य की विजय का तात्पर्य है कलियुग की समाप्ति और सतयुग का प्रारंभ । इस युग में खण्डवृष्टि, अल्पवृष्टि तथा अतिवृष्ट तो होती ही है, इसके अलावा रात-दिन अधिकाधिक परिश्रम व विभिन्न पद्धतियों से जोताई-बोआई, निंदाई-गुड़ाई बोआई-सिंताई करने के बाद भी केवल कहीं-कहीं मात्र एक चौथाई खाद्यान्न उत्पन्न होता है। इसलिए केवल 25 प्रतिशत उत्पादन को ही कुल उत्पादन समझकर कलियुगीन मानव जाति को संतोष करना पड़ता है।

विद्यामान लेखन व प्रकाशन कालावधि ईसवी सन्2006 की स्थिति में यहाँ यह पुनः प्रासंगिक है कि कलियुग की पूर्णायु में से अभी मात्र 5106 वर्ष ही बीता है और अभी 426894 वर्ष शेष है। अर्थात् अभी केवल 1.18 प्रतिशत ही व्यतीत हुआ है और 98.82 प्रतिशत बचा हुआ है। अब प्रश्न उठता है कि वर्तमान में कलियुग ने जब मात्र 1.18 प्रतिशत ही अपना प्रभाव दिखाया है और जब हम इसी से तंग आकर आत्महत्या करने लगे हैं तो तब क्या करेंगे जब कलियुग अपने अन्तिम चरण में रहेगा ? एतएव काल गणना के अनुसार 25 प्रतिशत दण्डनीति के पालन को पूर्ण न्याय मानते हुए वर्तमान संदर्भ में एक सामान्य व्यक्ति के लिए यदि राजा अथवा प्रशासक इस कलियुग में दण्डनीति का कुल मिलाकर 23.82 प्रतिशत परिपालन करता है और 76.18 प्रतिशत उल्लंघन तो वह पूर्णतः न्याय करता है। यदि समाज हमें 76.18 प्रतिशत बाहिष्कृत करता है और अपरादी थी हमें 76.18 प्रतिशत प्रताड़ित करते हैं तो ठीक करते हैं। यही समय की मांग है और यही वक्त की पुकार ।

अतएव हमें मात्र 23.82 प्रतिशत दैनिक आवश्यकताओं की वस्तुओं से ही जीवन निर्वाह करना पड़ेगा। इसलिए हमें अभी अपनी वर्तमान शारीरिक व मानसिक शक्ति तथा आत्मबल को 76.18 प्रतिशत और अधिक बढ़ाना है, ताकि हम दैनिक आवश्यकताओं की अन्य वस्तुएं उपलब्ध कर सकें। हमें अभी अपनी सम्पूर्ण क्षमता में 76.18 प्रतिशत की वृद्धि करनी होगा, ताकि हम अपने व्यकितगत, पारिवारिक, सामाजिक एवं प्रशासनिक समस्याओं का समाधान कर सकें। हमें अभी अपनी अन्तरात्मा को इतना अधिक प्रबल बनाना है कि वह इस मृत्युलोक के 76.18 प्रतिशत अन्याय, अत्याचार, अपराध, दुष्कृत्य तथा पाप को सहन कर सके। हमारी मानसिकता को वर्तमान में 76.18 प्रतिशत आधात झेलने के लिए तैयार रहना ही है। निराश होकर, कायर होकर, आशंका या भय के कारण शरीर को त्याग देना एक प्रकार से पराज.य स्वीकार करना है। इसे हम जीवन द्रोह भी कह सकते हैं । ऐसी ‘आत्महत्या’ अथवा देहद्रोह, देशद्रोह के समान ही दण्डनीय अपराध है, इसलिए इसकी सर्वत्र निन्दा करनी ही चाहिए।

वर्तमान मानव स्वर्ग जाने का इच्छुक नहीं बल्कि स्वर्ग को इस धरती पर उतारने का इच्छुक है। प्रकृति मानव की कृत दासी बनी हुई है । अत्याधुनिक वैज्ञानिक किस क्षण क्या लेकर उपस्थित हो जाएं कोई नहीं बता सकता । एक समय था जब टी.बी. कुष्ठ रोग, हैजा तथा चेचक जैसी बीमारियों को असाध्य रोग समझा जाता था और तत्कालीन चिकित्सा जगत के पास इनका कोई इलाज ही नहीं था। आज ये लगभग सामान्य बीमारी जैसी ही है। अतएव निःसंदेह आज जो रोग हमें असाध्य लगते हैं वे कल साध्य भी हो सकते हैं। इन परिस्थितियों में मृत्युवरण जैसे कुंठित विचारधाराओं को प्रोत्साहन देने का कोई ओचित्य नहीं है।

आज हमारे वैज्ञानिक कैंसर तथा एड्स जैसे अनेक असाध्य रोगों को साध्यि बनाने की दिशा में अनेकानेक शोध कार्य कर रहे हैं, साथ ही जनमानस में नीत-नवीन ज्योति प्रज्जवलित कर रहे हैं। इसके बावजूद यदि इतनी जल्दी हथियार डाल देने से एक तो व्यक्तियों में घोर निराशावादी दृष्टिकोण पैदा हो जाएगा और दूसरा विभिन्न रोगों के निदान हेतु कार्यरत अनुसंधान कर्ता हतोत्साहित होंगे । वर्तमान में चिकित्सा जगत के पास एक से एक दर्दनाशक टेबलेट, केप्सूल एवं इंजेक्शन हैं जिस कारण आज स्थिति यह है कि मरीजों के लिए असहनीय यंत्रणा के अवसर आने की कोई गुंजाइश है ही नहीं। अतएवं चिकित्सकों द्वारा मरीजों को आत्महत्या हेतु सहायता दिया जाना इस शालीन तथा स्वस्थ व्यवसाय के प्रति विश्वासघात व कुठाराघात के अलावा कुछ नहीं है। यह न केवल चिकित्सा व्यवसाय संहिता के विपरीत है वरन अवैधानिक तथा अमानवीय भी है।

चलिए कुछ क्षण के लिए मान भी जाते हैं कि ‘आत्महत्या’ का अधिकार होना चाहिए। अब हमें इसे वैध घोषित करने के लिए विधिवत मानदण्ड का निर्धारण तो करना ही पड़ेगा । सबसे पहले बीमारी को लें, क्योंकि बीमार व्यक्ति सर्वाधिक पीड़ित होता है। अद्भुत किन्तु पूर्णतः सत्य है कि पागल ‘आत्महत्या’ करना नहीं चाहते । यह इस बात से स्पष्ट है कि पागल अपेक्षाकृत बहुत कम या यों कहें कि लगभग नहीं के बराबर ‘आत्महत्या’ करते हैं, तो इन्हें आत्महत्या का अधिकार देना इनके इच्छा के विरूद्ध होगा और मानसिक रूप से मानसिकता के लिए घोर अन्याय । चूंकि प्रबुद्धजन अपेक्षाकृत अधिक ‘आत्महत्या’ करते हैं, इसलिए बुद्धिमान या प्रतिभासम्पन्न व्यक्तियों को ‘आत्महत्या’ का अधिकार देना तर्कसंगत नहीं और मूर्ख तो मूर्ख हैं ही । उन्हें क्या मालूम दयामृत्यु किस चिड़िया का नाम है ? इसके बावजूद वे भी नहीं चाहते-दयामृत्यु । अब इनकी इच्छा के विरूद्ध इन्हें ‘आत्माहत्या’ का अधिकार देना वास्तव मै दयामृत्यु कहां हुआ ? इसके अलावा बंदर के हाथ में उस्तरा देना कहां की बुद्धिमानी है ? यदि हम बहुमत के आधार पर मानदण्ड नियत करें तो एक सर्वेश्रण के अनुसार भारत में प्रतिदिन मात्र। 1-33 प्रतिशत लोग ‘आत्महत्या’ करते हैं और शेष 98.67 प्रतिशत लोग प्राकृतिक मौत मरते है । अब हम अति अल्पमत की इच्छा के आधार पर प्रचंड बहुमत का निरादर कैसे करें ? इस प्रकार स्पष्ट है कि ‘आत्महत्या’ किसी भी दृष्टिकोण से न्यायसंगत नहीं।

मानव इस प्रकृति की श्रेष्टतम रचना है, इसलिए इस समाप्त करने का अधिकार प्रकृति के अलावा और किसी को नहीं होना चाहिए। स्वयं को भी नहीं । जब हम में किसी मृतात्मा को जीवन दान देने की क्षमता नहीं, तब हमें किसी जीवात्मा अथवा स्वयं का जीवन लेने का अधिकार भी नहीं होना चाहिए। यदि मनुष्य को अपनी इच्छानुसार मृत्युवरण का अधिकार दे दिया जाए तो बाह्य रूप से दूसरों की दया पर आश्रित एवं अशक्त व्यक्तियों के लिए तथाकथित सुखमय मृत्यु तो होगी, लेकिन इससे आंतरिक कलह पैदा हो जायेगी । यदि ऐसा अधिकार प्राप्त हो गया तो न केवल पारिवारिक, सामाजिक व राष्ट्रीय बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारी विषमता पैदा हो जाएगी । इससे मनुष्यों में मृत्यु से अंतिम दम तक संघर्ष करने की क्षमता का लोप हो जाएगा। अभावग्रस्त, असहाय तथा वृद्धजनों का मृत्यु संख्या में अचानक वृद्धि हो जाएगी। ‘आत्महत्या’ के प्रकरण तो बढ़ेगा ही साथ ही विभिन्न स्वार्थी तत्वों तथा अपराधियों को किसी की हत्या करने का इससे अच्छा और कोई बहाना नहीं मिलेगा। तात्पर्य यह कि दयामृत्यु से स्वयं की इच्छापूर्ति कम और स्वार्थी तत्वों की इच्छापूर्ति अधिक होगी।

अब रहा सवाल कर्मचारी या अधिकारी काम नहीं करना चाहते, कोई भी गृहणी गृहकार्य करना नहीं चाहती अब यदि इनके न चाहने पर इन्हें अपने कर्तव्य पालन से छूट दे दी जाए तो क्या होगा ? लिखने की आवश्यकता नहीं। जुआड़ी भी खुले मैदान में खेल भावना का प्रदर्शन करना चाहता है, पाकिटमार भी असंख्य दर्शकों के बीच अपनी कतरन कलाकारी दिखाना चाहता है और देह व्यापारी तो अपना सर्वस्व दान करने हेतु उतावले हैं ही। यदि इन्हें चाहने पर जहां कहीं भी अपनी इच्छा प्रदर्शित करने का अधिकार दे दिया जाए तो अन्य व्यवसायिकों को अपनी पलकें बंद करनी पड़ेगी और लेखक को अपनी लेखनी।
****************